सिरपुर के प्राचीन मंदिरों से बस्तर की स्थापत्य परंपरा और नवा रायपुर की आधुनिक योजना तक—छत्तीसगढ़ की वास्तुकला बदलते समय के साथ गढ़ रही नई पहचान
रायपुर। किसी शहर की पहचान केवल उसकी सड़कों, इमारतों और बाजारों से नहीं बनती। उसकी असली पहचान उसके स्थापत्य, स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और लोगों की जीवनशैली में दिखाई देती है। वास्तुकला इन्हीं सभी तत्वों को जोड़कर किसी स्थान का चरित्र गढ़ती है।
हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को विश्व वास्तुकला दिवस (World Architecture Day) मनाया जाता है। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ आर्किटेक्ट्स (UIA) ने वर्ष 1985 में इसकी शुरुआत की थी। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र के विश्व पर्यावास दिवस के समानांतर मनाया जाता है और इसका उद्देश्य शहरों, आवास तथा मानव पर्यावास के भविष्य पर विमर्श को बढ़ावा देना है।
वर्ष 2026 में इसका संदेश विशेष रूप से आवास के अधिकार से जुड़ा है। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के संदर्भ में वास्तुकला को देखना दिलचस्प है, क्योंकि यहां प्राचीन मंदिर स्थापत्य, आदिवासी जीवन से जुड़ी स्थानीय निर्माण परंपराएं, राजमहलों की विरासत और आधुनिक नियोजित शहर—सभी एक साथ दिखाई देते हैं।
सिरपुर: ईंटों और पत्थरों में दर्ज स्थापत्य का इतिहास
छत्तीसगढ़ की वास्तुकला की चर्चा सिरपुर के बिना अधूरी है। महानदी के किनारे स्थित सिरपुर प्राचीन दक्षिण कोसल का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां बौद्ध विहारों, शिव-विष्णु मंदिरों और अन्य पुरातात्विक अवशेषों का व्यापक समूह मिलता है।
राज्य के संस्कृति विभाग के अनुसार सिरपुर का पुरातात्विक क्षेत्र 10 वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैले अनेक महत्वपूर्ण अवशेषों को समेटे हुए है। लक्ष्मण मंदिर, विभिन्न विहार, शिव मंदिर और सुरंग टीला जैसे स्थल इस क्षेत्र की स्थापत्य विविधता को सामने रखते हैं।
सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां वास्तुकला केवल इमारत नहीं, बल्कि धर्म, कला, तकनीक और तत्कालीन सामाजिक जीवन का दस्तावेज बन जाती है।
भोरमदेव: पत्थरों पर जीवंत शिल्प
कबीरधाम का भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ की स्थापत्य पहचान का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है। 11वीं शताब्दी का यह शिव मंदिर अपनी बारीक पत्थर नक्काशी और स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। इसे अक्सर छत्तीसगढ़ का ‘खजुराहो’ भी कहा जाता है।
मंदिर परिसर की मूर्तिकला और स्थापत्य यह बताता है कि उस दौर में भवन निर्माण केवल उपयोगिता तक सीमित नहीं था। उसमें सौंदर्य, धार्मिक प्रतीक, मानवीय जीवन और प्रकृति—सभी को स्थान दिया जाता था।
बस्तर: जहां वास्तुकला में प्रकृति और संस्कृति साथ चलते हैं
बस्तर की स्थापत्य परंपरा को केवल राजमहलों या मंदिरों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यहां स्थानीय जीवन, जंगल, जलवायु, उपलब्ध सामग्री और सामुदायिक संस्कृति ने आवासीय एवं सार्वजनिक संरचनाओं की अपनी शैली विकसित की है।
जगदलपुर का बस्तर पैलेस ऐतिहासिक स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है। सरकारी पर्यटन जानकारी के अनुसार महल की दीवारों और छतों पर कलात्मक नक्काशी और सज्जा दिखाई देती है। वहीं नारायणपाल का लगभग 1,000 वर्ष पुराना विष्णु मंदिर भी बस्तर की स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें चालुक्य स्थापत्य का प्रभाव बताया गया है।
यह विरासत आधुनिक वास्तुकारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा करती है—क्या आज की इमारतें अपने क्षेत्र की जलवायु, संस्कृति और स्थानीय सामग्री से उतना ही संवाद करती हैं, जितना पारंपरिक भवन करते थे?
नवा रायपुर: विरासत के बाद आधुनिक नियोजन की चुनौती
छत्तीसगढ़ की वास्तुकला का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय नवा रायपुर अटल नगर है। यह एक नियोजित ग्रीनफील्ड शहर के रूप में विकसित किया गया है, जिसे राज्य की प्रशासनिक राजधानी के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई। इसकी योजना में आवासीय, संस्थागत, व्यावसायिक और अन्य आवश्यक शहरी सुविधाओं को एक साथ विकसित करने पर जोर दिया गया है।
नवा रायपुर की योजना में हरित क्षेत्र, पैदल और साइकिल आवागमन, जल निकासी, वर्षाजल प्रबंधन तथा स्मार्ट तकनीक जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है। विकास प्राधिकरण के अनुसार शहर के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से को वनीकरण के लिए आरक्षित रखने की योजना और गैर-मोटर चालित परिवहन के लिए साइकिल ट्रैक एवं पैदल मार्ग विकसित किए गए हैं।
यही वह जगह है जहां वास्तुकला और शहरी नियोजन एक-दूसरे से जुड़ते हैं। अच्छी वास्तुकला केवल सुंदर इमारत नहीं बनाती, बल्कि यह भी तय करती है कि लोग उस शहर में कैसे चलेंगे, कहां मिलेंगे, कितना खुला स्थान मिलेगा और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किस तरह होगा।
छत्तीसगढ़ के लिए जरूरी है ‘स्थानीय वास्तुकला’
विश्व वास्तुकला दिवस 2026 की आवास-केंद्रित थीम छत्तीसगढ़ के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देती है। राज्य में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। रायपुर, नवा रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई और अन्य शहरों में आवासीय तथा व्यावसायिक निर्माण का विस्तार हो रहा है।
ऐसे में भविष्य की वास्तुकला के सामने केवल ऊंची और आधुनिक इमारतें बनाने की चुनौती नहीं है। असली चुनौती है—
ऐसे भवन बनाना जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हों, ऊर्जा की कम खपत करें, वर्षाजल का संरक्षण करें, गर्मी को कम करें, दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के लिए सुगम हों तथा स्थानीय सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़े रहें।
छत्तीसगढ़ जैसे गर्म जलवायु वाले प्रदेश में भवनों की दिशा, वेंटिलेशन, छायादार स्थान, हरित क्षेत्र और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप डिजाइन का महत्व और बढ़ जाता है।
मिट्टी, पत्थर और स्थानीय ज्ञान से आधुनिक डिजाइन तक
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक स्थापत्य विरासत हमें यह सिखाती है कि निर्माण तकनीक केवल आधुनिक मशीनों और महंगी सामग्री पर निर्भर नहीं होती। स्थानीय संसाधनों और सदियों के अनुभव से भी टिकाऊ भवन बनाए जा सकते हैं।
आज जब दुनिया ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर विचार कर रही है, तब पारंपरिक वास्तु ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
भविष्य में छत्तीसगढ़ के वास्तुकारों के सामने एक रोचक अवसर है—बस्तर की सांस्कृतिक संवेदना, सिरपुर की स्थापत्य विरासत और नवा रायपुर की आधुनिक शहरी योजना से सीख लेकर ऐसी नई वास्तुकला विकसित करना, जो स्थानीय भी हो और भविष्यवादी भी।
‘बड़ा’ नहीं, ‘बेहतर’ भवन हो वास्तुकला की पहचान
आज वास्तुकला को अक्सर गगनचुंबी इमारतों, आधुनिक कार्यालयों और शानदार आवासीय परियोजनाओं के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन विश्व वास्तुकला दिवस का मूल संदेश इससे कहीं व्यापक है।
एक छोटा, सुरक्षित और हवादार घर भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी कोई बड़ी सार्वजनिक इमारत। एक ऐसा स्कूल, जहां बच्चों को प्राकृतिक रोशनी और पर्याप्त खुला स्थान मिले, भी उत्कृष्ट वास्तुकला का उदाहरण हो सकता है। ऐसा अस्पताल, जहां मरीज, बुजुर्ग और दिव्यांग व्यक्ति आसानी से पहुंच सकें, वास्तुकला की सामाजिक भूमिका को दर्शाता है।
2026 की थीम इसी सोच को आगे बढ़ाती है—आवास केवल बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि मानव गरिमा से जुड़ा अधिकार है।
छत्तीसगढ़ की अगली स्थापत्य कहानी कैसी होगी?
छत्तीसगढ़ की स्थापत्य यात्रा हजारों वर्ष पुरानी विरासत से शुरू होकर आज आधुनिक नियोजित शहरों तक पहुंच चुकी है। आगे की राह में चुनौती यह है कि विकास और विरासत, आधुनिकता और स्थानीयता, तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सिरपुर हमें अतीत की तकनीक और कला की याद दिलाता है, बस्तर हमें प्रकृति और संस्कृति के साथ निर्माण का सबक देता है, जबकि नवा रायपुर भविष्य के नियोजित शहर की संभावनाओं को सामने रखता है।
विश्व वास्तुकला दिवस पर छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ा सवाल शायद यही है—क्या हम ऐसी वास्तुकला तैयार कर सकते हैं, जिसमें विकास की गति के साथ प्रदेश की मिट्टी, मौसम, संस्कृति और आम लोगों की जरूरतें भी दिखाई दें?
यदि इसका उत्तर ‘हां’ है, तो छत्तीसगढ़ की अगली स्थापत्य पहचान केवल आधुनिक इमारतों की नहीं होगी, बल्कि मानव-केंद्रित, पर्यावरण-संवेदी और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी वास्तुकला की होगी।
Author: cg24x7




