छत्तीसगढ़ की पहचान केवल प्राकृतिक संपदा, वनांचलों और ऐतिहासिक धरोहरों से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोककला, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला और शिल्प परंपराओं से भी बनती है। पंडवानी की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा से लेकर बस्तर की ढोकरा कला, सरगुजा की भित्तिचित्र परंपरा, राउत नाचा, पंथी, करमा और सुआ नृत्य तक प्रदेश के कलाकारों ने पीढ़ियों से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखा है। अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस हमें इन कलाकारों के योगदान, उनकी चुनौतियों और बदलते समय में कला के भविष्य पर विचार करने का अवसर देता है।
cg24x7.in विशेष, 25 अक्टूबर, अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस पर विशेष आलेख, रायपुर। कला किसी समाज की संवेदनाओं, स्मृतियों और सांस्कृतिक चेतना की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति होती है। जब कोई कलाकार रंगों से चित्र बनाता है, मिट्टी को आकार देता है, लोकगीत गाता है, मंच पर अभिनय करता है या नृत्य के माध्यम से अपनी परंपराओं को प्रस्तुत करता है, तब वह केवल अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि अपने समाज की सामूहिक स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य भी करता है।
25 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस (International Artist Day) इसी सृजनशीलता, कल्पनाशक्ति और मानव सभ्यता में कलाकारों के योगदान को सम्मानित करने का अवसर है।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में इस दिवस का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यहां कला केवल मंचों, दीर्घाओं या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। यह गांवों की चौपालों, जनजातीय समुदायों की परंपराओं, पर्व-त्योहारों, खेत-खलिहानों, धार्मिक अनुष्ठानों और सामान्य जनजीवन में गहराई से रची-बसी है।
लोककला की जीवंत प्रयोगशाला है छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों से लेकर बस्तर, सरगुजा और जशपुर के वनांचलों तक लोककलाओं के अनेक स्वरूप विकसित हुए हैं।
पंथी नृत्य में सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना दिखाई देती है, तो राउत नाचा में सामुदायिक उत्साह और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतिबिंब मिलता है। करमा नृत्य प्रकृति और सामूहिक जीवन से जुड़ा है, जबकि सुआ गीतों में महिलाओं की भावनाओं, सामाजिक संबंधों और लोकजीवन की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। बस्तर के जनजातीय नृत्य, मांदर की थाप, पारंपरिक वाद्ययंत्र और सामूहिक प्रस्तुतियां इस बात का प्रमाण हैं कि यहां कला मनोरंजन का साधन भर नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। इन कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका विकास किसी औपचारिक शिक्षण संस्थान में नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सामुदायिक अभ्यास और मौखिक परंपराओं के माध्यम से हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस की शुरुआत और इसका उद्देश्य
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस की शुरुआत वर्ष 2004 में कनाडा के चित्रकार क्रिस मैकक्ल्योर ने की थी। उन्होंने कलाकारों के सामाजिक योगदान को मान्यता देने के उद्देश्य से इस दिवस की परिकल्पना की। इसके लिए 25 अक्टूबर की तारीख चुनी गई, क्योंकि इसी दिन वर्ष 1881 में विश्वविख्यात चित्रकार पाब्लो पिकासो का जन्म हुआ था। वर्ष 2026 में इस आयोजन की शुरुआत के 22 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह दिवस एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक पहल है, न कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आधिकारिक दिवस।इस दिवस का मूल संदेश है कि कलाकारों का सम्मान केवल उनके प्रसिद्ध हो जाने के बाद नहीं, बल्कि उनके सृजनशील जीवन के दौरान भी होना चाहिए।
पंडवानी: छत्तीसगढ़ की मिट्टी से विश्व मंच तक पहुंची लोकगाथा
छत्तीसगढ़ की कला परंपरा की चर्चा पंडवानी के बिना अधूरी है। महाभारत की कथाओं को गायन, अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से जीवंत करने वाली यह लोकविधा प्रदेश की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। पद्म विभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई ने इस कला को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाई। जुलाई 2026 में उनके निधन के बाद उनकी कलात्मक विरासत और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
तीजन बाई की कला यात्रा इस बात का उदाहरण है कि सीमित संसाधनों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद प्रतिभा किस प्रकार विश्व स्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर सकती है। पंडवानी की वेदमती और कापालिक जैसी शैलियां कथावाचन की अलग-अलग अभिव्यक्तियां प्रस्तुत करती हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाने में झाडूराम देवांगन, ऋतु वर्मा और अनेक अन्य कलाकारों का भी योगदान रहा है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि पंडवानी जैसी विधाओं के नए कलाकारों को नियमित प्रशिक्षण, मंच और आर्थिक अवसर मिलें, ताकि यह परंपरा केवल इतिहास का विषय बनकर न रह जाए।
हबीब तनवीर और रंगमंच: जब छत्तीसगढ़ के लोककलाकार बने विश्व रंगमंच की पहचान
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास में हबीब तनवीर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लोककलाकारों की अभिनय क्षमता, छत्तीसगढ़ी भाषा और नाचा परंपरा को आधुनिक रंगमंच के साथ जोड़कर एक विशिष्ट नाट्यशैली विकसित की। उनके प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर ने छत्तीसगढ़ के लोककलाकारों की प्रतिभा को व्यापक पहचान दिलाई। हबीब तनवीर की रंगयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने लोककलाकारों को केवल सहायक भूमिका में नहीं रखा, बल्कि उनकी मौलिक अभिनय शैली और भाषा को रंगमंच की केंद्रीय शक्ति बनाया। छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकारों की सहज संवाद अदायगी, व्यंग्य, हास्य और सामाजिक सरोकारों ने आधुनिक भारतीय रंगमंच को नई अभिव्यक्ति दी। आज जब डिजिटल मनोरंजन के साधन तेजी से बढ़ रहे हैं, तब नाचा और लोकनाट्य जैसी परंपराओं के संरक्षण के लिए गांवों से शहरों तक नए मंच विकसित करना आवश्यक है।
बस्तर की शिल्पकला: धातु, मिट्टी और लकड़ी में जीवंत होती सांस्कृतिक स्मृतियां
बस्तर की पहचान उसकी अनूठी जनजातीय शिल्प परंपराओं से भी है। यहां की ढोकरा कला, लौहशिल्प, काष्ठकला और मिट्टी की मूर्तियां स्थानीय समाज की धार्मिक आस्थाओं, प्रकृति से संबंधों और पारंपरिक जीवनशैली को अभिव्यक्त करती हैं। विशेष रूप से ढोकरा कला में धातु ढलाई की पारंपरिक तकनीक का उपयोग कर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, लोकजीवन और सांस्कृतिक प्रतीकों की आकृतियां तैयार की जाती हैं। इसी प्रकार लौहशिल्प में साधारण लोहे को कलात्मक आकार देकर सजावटी और पारंपरिक उपयोग की वस्तुएं बनाई जाती हैं। बांस, लकड़ी और मिट्टी से निर्मित शिल्प भी प्रदेश की कला विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन इस कला का आर्थिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अनेक पारंपरिक शिल्पकारों के सामने उचित मूल्य, बाजार तक सीधी पहुंच, डिजाइन नवाचार और अगली पीढ़ी को प्रशिक्षण देने जैसी चुनौतियां हैं। बस्तर की शिल्पकला को पर्यटन, ऑनलाइन विपणन और आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर स्थानीय कलाकारों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
सरगुजा और जनजातीय अंचलों की चित्रकला: दीवारों पर अंकित संस्कृति
लोकसंगीत और नृत्य: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धड़कन
महिला कलाकारों की भूमिका: परंपराओं के संरक्षण से वैश्विक पहचान तक
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में महिला कलाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। सुआ गीत, पारंपरिक लोकगायन, भित्तिचित्र, गोदना, हस्तशिल्प और विभिन्न सामुदायिक नृत्यों में महिलाओं ने पीढ़ियों से सांस्कृतिक ज्ञान को आगे बढ़ाया है। तीजन बाई जैसी कलाकारों ने यह भी सिद्ध किया कि कला के क्षेत्र में स्थापित सामाजिक सीमाओं को प्रतिभा, साहस और निरंतर अभ्यास से चुनौती दी जा सकती है। आज आवश्यकता है कि ग्रामीण और जनजातीय महिला कलाकारों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, सुरक्षित कार्यस्थल, विपणन सुविधाएं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समान अवसर उपलब्ध हों।
डिजिटल युग में छत्तीसगढ़ी कलाकारों के लिए नई संभावनाएं
डिजिटल तकनीक ने कला के सृजन और प्रसार की दुनिया बदल दी है। सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म, डिजिटल संगीत, एनीमेशन और ऑनलाइन कला बाजार ने कलाकारों को पारंपरिक मंचों से आगे पहुंचने का अवसर दिया है। छत्तीसगढ़ी लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, लघु फिल्में और स्थानीय भाषा में निर्मित डिजिटल सामग्री अब भौगोलिक सीमाओं से बाहर दर्शकों तक पहुंच सकती हैं। छत्तीसगढ़ी सिनेमा, जिसे लोकप्रिय रूप से छॉलीवुड कहा जाता है, भी प्रदेश के कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों, तकनीशियनों और फिल्मकारों के लिए अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। हालांकि डिजिटल विस्तार के साथ कुछ नए प्रश्न भी सामने आए हैं। कलाकारों की रचनाओं का बिना अनुमति उपयोग, उचित पारिश्रमिक का अभाव, कॉपीराइट की जानकारी की कमी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कलात्मक सामग्री का पुनरुत्पादन जैसी चुनौतियों पर गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। डिजिटल तकनीक कलाकारों की सहयोगी बने, उनके श्रम और मौलिकता का विकल्प नहीं—इस दिशा में नीतिगत और सामाजिक संवेदनशीलता आवश्यक है।
कला संरक्षण की चुनौती: सम्मान के साथ आजीविका भी जरूरी
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल प्रसिद्ध कलाकारों का सम्मान करना नहीं, बल्कि उन हजारों कलाकारों की स्थिति पर भी विचार करना है, जिनका जीवन कला के अभ्यास और प्रदर्शन पर निर्भर है। छत्तीसगढ़ के अनेक ग्रामीण कलाकारों के लिए कला आजीविका का नियमित और पर्याप्त साधन नहीं बन पाती। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनियमितता, सीमित पारिश्रमिक, यात्रा और वाद्ययंत्रों का खर्च तथा सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी समस्याएं उनके सामने आती हैं। कला संरक्षण के लिए कुछ बुनियादी प्रयास महत्वपूर्ण हो सकते हैं:
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कलाकारों का दस्तावेजीकरण: पारंपरिक विधाओं और उनके गुरुओं की पहचान कर डिजिटल अभिलेख तैयार करना।
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प्रशिक्षण और उत्तराधिकार: अनुभवी कलाकारों के माध्यम से युवाओं को व्यवस्थित प्रशिक्षण देना।
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आर्थिक सुरक्षा: जरूरतमंद कलाकारों के लिए पारदर्शी सहायता, बीमा और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना।
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बाजार और मंच: लोककलाकारों तथा शिल्पकारों को नियमित प्रदर्शन, बिक्री और उचित पारिश्रमिक के अवसर देना।
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शिक्षा से जुड़ाव: विद्यालयों और महाविद्यालयों में स्थानीय कला, संगीत और शिल्प को व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ना।
पर्यटन और रचनात्मक अर्थव्यवस्था का आधार बन सकती है कला
छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक पर्यटन की व्यापक संभावनाएं हैं। बस्तर दशहरा, मड़ई मेलों, चक्रधर समारोह और विभिन्न स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से प्रदेश की कलाओं को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के अवसर उपलब्ध होते हैं। सिरपुर की ऐतिहासिक विरासत, बस्तर की जनजातीय संस्कृति, रायगढ़ की संगीत परंपरा और सरगुजा की लोककलाएं मिलकर सांस्कृतिक पर्यटन का विशिष्ट आधार तैयार करती हैं। यदि पर्यटन विकास में स्थानीय कलाकारों की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो इससे कला संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि पर्यटन स्थलों पर स्थानीय कलाकारों को नियमित प्रदर्शन स्थल, शिल्प विक्रय केंद्र और उचित पारिश्रमिक उपलब्ध कराया जाए।
भविष्य की दिशा: कला केवल विरासत नहीं, विकास का माध्यम भी
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक नीति और विकास की प्राथमिकताओं में कला को केवल उत्सवों या सरकारी आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, रोजगार, पर्यटन, उद्यमिता और सामाजिक विकास के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। प्रदेश में कला प्रशिक्षण केंद्रों, सामुदायिक सांस्कृतिक भवनों, जिला स्तरीय कला दीर्घाओं और डिजिटल अभिलेखागारों का विस्तार उपयोगी हो सकता है। विशेष रूप से दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों के कलाकारों के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिससे उन्हें अपनी कला के प्रदर्शन के लिए महानगरों पर निर्भर न रहना पड़े। स्थानीय भाषा में कला शिक्षा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों का संरक्षण और गुरु-शिष्य परंपरा को संस्थागत सहयोग देना भी महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष: कलाकार बचेंगे तो संस्कृति बचेगी
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस छत्तीसगढ़ को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के साथ उसके भविष्य के प्रति जिम्मेदार होने का संदेश देता है। किसी भी समाज की पहचान केवल उसके भवनों, सड़कों और आर्थिक उपलब्धियों से नहीं बनती। उसकी वास्तविक पहचान उन गीतों में भी होती है, जिन्हें पीढ़ियां गाती हैं; उन नृत्यों में होती है, जिनमें समुदाय अपनी खुशियां साझा करता है; और उन कलाकृतियों में होती है, जिनमें इतिहास, आस्था और जीवन की स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं। छत्तीसगढ़ के कलाकार इसी सांस्कृतिक निरंतरता के संवाहक हैं। 25 अक्टूबर का संदेश स्पष्ट है—कला का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब कलाकारों को सम्मानजनक जीवन, सृजन की स्वतंत्रता, आर्थिक सुरक्षा और अपनी प्रतिभा विकसित करने के पर्याप्त अवसर मिलेंगे। क्योंकि कलाकार केवल संस्कृति के संरक्षक नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता, रचनात्मकता और भविष्य के निर्माता भी हैं।
Author: cg24x7



