नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज होती रफ्तार और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव के बीच ब्रिटेन के पूर्व मंत्री सर विंस केबल ने भारत को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस सदी के मध्य तक भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिका की अर्थव्यवस्था के बराबर पहुंच सकती है।
विंस केबल ने भारत को एक ‘स्विंग कंट्री’ यानी ऐसा देश बताया, जिसकी विदेश नीति और रणनीतिक दिशा में बदलाव का असर व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर पड़ सकता है। उनके मुताबिक भारत जिस दिशा में आगे बढ़ेगा, उसका प्रभाव केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी दिखाई देगा।
भारत की दिशा बदलने से बदल सकता है वैश्विक समीकरण
पूर्व ब्रिटिश मंत्री का कहना है कि भारत आज ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है जहां उसके रणनीतिक और आर्थिक फैसले वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
उन्होंने भारत को ‘स्विंग कंट्री’ बताते हुए संकेत दिया कि दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच भारत का रुख किसी एक धड़े के पक्ष में जाने या संतुलित नीति अपनाने से अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदल सकते हैं।
भारत लंबे समय से अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता रहा है। वह अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ भी उसके ऐतिहासिक और रक्षा संबंध कायम हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भारत का जुड़ाव भी बढ़ा है।
आर्थिक ताकत के साथ बढ़ रहा है भारत का वैश्विक प्रभाव
भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बड़ी आबादी, विशाल घरेलू बाजार, बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम, विनिर्माण क्षेत्र में निवेश और बुनियादी ढांचे के विस्तार को भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत माना जाता है।
इन्हीं कारणों से भारत को आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्रों में शामिल किए जाने की संभावना जताई जाती रही है।
विंस केबल का यह अनुमान इसी व्यापक धारणा को रेखांकित करता है कि यदि भारत की आर्थिक वृद्धि लंबे समय तक मजबूत बनी रहती है, तो वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में उसका हिस्सा लगातार बढ़ सकता है।
अमेरिका के बराबर पहुंचने का मतलब क्या होगा?
यदि भारतीय अर्थव्यवस्था वास्तव में इस सदी के मध्य तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था के करीब पहुंचती है, तो इसका वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव हो सकता है।
ऐसी स्थिति में भारत केवल दुनिया का बड़ा बाजार ही नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक निवेश, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, रक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े फैसलों में उसकी भूमिका और बढ़ सकती है।
भारत की आर्थिक ताकत बढ़ने के साथ बहुपक्षीय संस्थाओं में उसकी भूमिका मजबूत करने की मांग भी तेज हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता समेत वैश्विक संस्थाओं में सुधार की भारतीय मांग को भी इससे नई ताकत मिल सकती है।
‘स्विंग कंट्री’ के रूप में भारत की खास स्थिति
विंस केबल द्वारा भारत के लिए इस्तेमाल किया गया ‘स्विंग कंट्री’ शब्द मौजूदा वैश्विक भू-राजनीति में खास महत्व रखता है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत किसी एक शक्ति गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करता रहा है।
भारत क्वाड जैसे मंचों पर अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग करता है, वहीं रूस से रक्षा और ऊर्जा संबंध भी बनाए रखता है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर संवाद जारी रहता है।
यही संतुलन भारत को वैश्विक शक्ति समीकरण में एक महत्वपूर्ण ‘स्विंग’ शक्ति बनाता है।
ब्रिटेन के लिए भी भारत महत्वपूर्ण
विंस केबल का बयान ब्रिटेन-भारत संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। भारत की आर्थिक ताकत बढ़ने के साथ ब्रिटेन सहित यूरोपीय देशों के लिए भारत के साथ व्यापार, निवेश, तकनीक और रणनीतिक सहयोग का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को विस्तार देने की कोशिशें भी इसी बदलती वैश्विक आर्थिक तस्वीर का हिस्सा हैं।
भारत के सामने भी हैं बड़ी चुनौतियां
हालांकि, भारत के अमेरिका के बराबर पहुंचने का अनुमान कई आर्थिक और नीतिगत परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। लंबे समय तक उच्च आर्थिक विकास दर बनाए रखना, रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना, मानव पूंजी में निवेश, विनिर्माण क्षमता बढ़ाना और वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाना इसके लिए महत्वपूर्ण होगा।
इसके साथ ही ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और आय असमानता जैसी चुनौतियों से निपटना भी जरूरी होगा।
इसलिए विंस केबल का अनुमान भारत की संभावित आर्थिक शक्ति की ओर इशारा करता है, लेकिन इसे एक दीर्घकालिक पूर्वानुमान के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
आने वाले दशकों में भारत पर टिकी रहेंगी दुनिया की निगाहें
विंस केबल का बयान एक व्यापक वैश्विक धारणा को सामने लाता है—भारत आने वाले दशकों में सिर्फ आर्थिक रूप से बड़ा देश नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला प्रमुख केंद्र बन सकता है।
अगर भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और रणनीतिक स्वायत्तता को लगातार मजबूत करता है, तो इस सदी के मध्य तक विश्व व्यवस्था में उसकी भूमिका आज की तुलना में कहीं अधिक निर्णायक हो सकती है। यही वजह है कि भारत की आर्थिक और विदेश नीति की दिशा पर अब सिर्फ पड़ोसी देशों की नहीं, बल्कि दुनिया की बड़ी शक्तियों की भी नजर है।
Author: cg24x7





