विश्व नारियल दिवस: समुद्र से दूर छत्तीसगढ़ में भी लहलहा रहा ‘कल्पवृक्ष’, कोंडागांव बना नारियल खेती का मॉडल

बस्तर की जमीन पर नारियल की नई कहानी, कोंडागांव के नारियल विकास बोर्ड प्रक्षेत्र से किसानों को मिल रहा प्रशिक्षण, पौधे और बहुस्तरीय खेती का रास्ता

रायपुर, 2 सितंबर 2026। आमतौर पर नारियल की खेती का नाम आते ही केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे समुद्र तटीय या दक्षिण भारतीय राज्यों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन छत्तीसगढ़ ने इस पारंपरिक धारणा को काफी हद तक बदलने का काम किया है। समुद्र से दूर स्थित राज्य में भी नारियल की खेती किसानों के लिए एक संभावनाशील बागवानी विकल्प बन रही है। खास तौर पर बस्तर संभाग के कोंडागांव में नारियल विकास बोर्ड का प्रक्षेत्र इस बदलाव की महत्वपूर्ण मिसाल बनकर उभरा है।

हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य नारियल की खेती, इसके उपयोग, प्रसंस्करण, विपणन और इससे जुड़े किसानों तथा उद्योगों की संभावनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस इंटरनेशनल कोकोनट कम्युनिटी (ICC) के स्थापना दिवस से जुड़ा है। भारत इस संगठन का संस्थापक सदस्य है।

इस वर्ष विश्व नारियल दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के लिए सबसे दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश में नारियल की खेती अब केवल प्रयोग या सीमित बागवानी गतिविधि नहीं रह गई है। कोंडागांव से लेकर बस्तर के किसानों तक नारियल को आय के अतिरिक्त और दीर्घकालिक स्रोत के रूप में अपनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं।

कोंडागांव ने बदली धारणा

नारियल को सामान्यतः अधिक आर्द्र और तटीय जलवायु वाली फसल माना जाता है। इसके बावजूद कोंडागांव स्थित नारियल विकास बोर्ड के प्रदर्शन सह बीज उत्पादन प्रक्षेत्र (DSP Farm) ने गैर-पारंपरिक क्षेत्र में इसकी संभावनाओं को प्रदर्शित किया है।

नारियल विकास बोर्ड की आधिकारिक सामग्री के अनुसार कोंडागांव में संचालित यह प्रक्षेत्र किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराने और वैज्ञानिक नारियल खेती की तकनीक को बढ़ावा देने का काम करता है। बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट में भी कोंडागांव को उसके प्रदर्शन सह बीज उत्पादन प्रक्षेत्रों में शामिल किया गया है।

बोर्ड के 2024 के Indian Coconut Journal में कोंडागांव फार्म को छत्तीसगढ़ के गैर-पारंपरिक क्षेत्र में नारियल खेती की उल्लेखनीय मिसाल बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक यहां हजारों नारियल के पेड़ हैं और नारियल के साथ अन्य बागवानी एवं मसाला फसलों को भी बहुस्तरीय खेती के रूप में जोड़ा गया है। पिछले एक दशक में इस फार्म से लाखों नारियल और बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार किए जाने का उल्लेख भी बोर्ड की सामग्री में है।

समुद्र नहीं, फिर भी नारियल की भरपूर संभावनाएं

छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति नारियल उत्पादक पारंपरिक राज्यों से अलग है। फिर भी बस्तर पठार में नारियल को कृषि विविधीकरण के विकल्प के तौर पर विकसित करने की कोशिश हो रही है।

केंद्र सरकार की अगस्त 2026 की पृष्ठभूमि सामग्री में भी छत्तीसगढ़ का उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया कि बस्तर पठार के किसान परंपरागत रूप से धान, मोटे अनाज, मक्का और लघु वनोपज पर निर्भर रहे हैं। अब नारियल विकास बोर्ड के कोंडागांव प्रक्षेत्र के प्रयासों से नारियल की खेती धीरे-धीरे एक आशाजनक आजीविका विकल्प के रूप में उभर रही है।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नारियल एक बार स्थापित होने के बाद लंबे समय तक उत्पादन देने वाली फसल है। ऐसे में किसान इसे दूसरी फसलों के साथ जोड़कर अपनी आय के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं।

नारियल के साथ कोको, कॉफी और काली मिर्च भी

कोंडागांव मॉडल की सबसे खास बात केवल नारियल का उत्पादन नहीं, बल्कि बहुस्तरीय खेती है। नारियल के पेड़ों के बीच उपलब्ध स्थान का उपयोग कोको, कॉफी, काली मिर्च, केला, हल्दी और अन्य फसलों के लिए किया जा सकता है।

नारियल विकास बोर्ड की सफलता-कहानी में बस्तर के किसानों के बीच इसी मॉडल को अपनाने का उल्लेख है। किसानों को यह समझाया गया कि नारियल के पेड़ों से नियमित उत्पादन शुरू होने तक खाली स्थान में अंतरवर्ती फसलें लेकर आय प्राप्त की जा सकती है। इससे शुरुआती वर्षों में नारियल के पेड़ों की प्रतीक्षा अवधि का आर्थिक दबाव कम किया जा सकता है।

यही मॉडल छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां किसान एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय बागवानी और मिश्रित खेती के जरिए आय के कई रास्ते तलाश सकते हैं।

कोंडागांव से किसानों तक पहुंच रहे पौधे

कोंडागांव का नारियल विकास बोर्ड प्रक्षेत्र केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। यहां गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करने और किसानों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जाता है।

बोर्ड की पुरानी तकनीकी सामग्री में इस प्रक्षेत्र द्वारा बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण नारियल पौध तैयार करने तथा किसानों को वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण देने का उल्लेख है।

हाल के वर्षों में कोंडागांव केंद्र को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में भी बड़ी संख्या में पौधे तैयार करने और किसानों को उपलब्ध कराने की जानकारी सामने आई है। केंद्र में नारियल के साथ कोको, कॉफी, काली मिर्च और अन्य फसलों का प्रदर्शन भी किया जाता है।

किसान ईशांश सिंह राठौर की कहानी भी बनी मिसाल

छत्तीसगढ़ में नारियल की खेती को लेकर बदलाव केवल सरकारी फार्म तक सीमित नहीं है। बस्तर के किसान भी इसे अपनाने लगे हैं।

केंद्र सरकार की अगस्त 2026 की पृष्ठभूमि सामग्री में बकावंड ब्लॉक के किसान ईशांश सिंह राठौर का उदाहरण दिया गया है। किसान परिवार से आने वाले राठौर ने नारियल विकास बोर्ड से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर नारियल की खेती को व्यवस्थित रूप से अपनाया। उनके खेत में नारियल के साथ दूसरी फसलों को जोड़कर बहुस्तरीय खेती का मॉडल विकसित किया गया।

यह उदाहरण बताता है कि छत्तीसगढ़ में नारियल की कहानी केवल सरकारी प्रक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि किसान स्तर पर भी इसके प्रयोग बढ़ रहे हैं।

‘कल्पवृक्ष’ सिर्फ फल नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था

नारियल को अक्सर ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है, क्योंकि इसके लगभग हर हिस्से का उपयोग किया जा सकता है। नारियल पानी और गिरी खाद्य उपयोग में आती है, जबकि तेल, नारियल दूध, सूखा नारियल, कोकोपीट, रेशा और खोल से बनने वाले उत्पादों का अलग बाजार है।

भारत में नारियल का आर्थिक महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। 2024-25 में देश में लगभग 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल की खेती और करीब 2,030 करोड़ नारियल के उत्पादन का आंकड़ा सामने आया है। भारत वैश्विक नारियल उत्पादन में लगभग 31 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दुनिया का प्रमुख उत्पादक है।

अब चुनौती केवल अधिक नारियल पैदा करने की नहीं है, बल्कि उसके प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन की भी है। नारियल पानी, वर्जिन नारियल तेल, नारियल दूध, डेसिकेटेड कोकोनट और खोल से बनने वाले औद्योगिक उत्पाद किसानों और उद्यमियों के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता खोल सकते हैं।

छत्तीसगढ़ के लिए क्यों महत्वपूर्ण है नारियल?

छत्तीसगढ़ में नारियल खेती का विस्तार कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है—

  • किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।
  • पारंपरिक धान आधारित खेती में विविधता लाई जा सकती है।
  • बस्तर जैसे क्षेत्रों में बहुस्तरीय खेती को बढ़ावा मिल सकता है।
  • नारियल के साथ कोको, कॉफी, काली मिर्च और अन्य फसलों की खेती संभव हो सकती है।
  • पौध उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन से ग्रामीण रोजगार बढ़ सकता है।
  • नारियल आधारित छोटे उद्योग और स्वरोजगार की संभावनाएं बन सकती हैं।

विश्व नारियल दिवस पर छत्तीसगढ़ की अलग पहचान

विश्व नारियल दिवस का संदेश केवल नारियल खाने या इसके स्वास्थ्य लाभों तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य नारियल को कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्रसंस्करण और टिकाऊ आजीविका से जोड़ना है। नारियल विकास बोर्ड भी खेती के साथ प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, विपणन और निर्यात पर जोर देता रहा है।

ऐसे में छत्तीसगढ़ के लिए कोंडागांव की कहानी खास मायने रखती है। कभी जिस फसल को समुद्र तटों और दक्षिण भारत से जोड़कर देखा जाता था, वही अब बस्तर की जमीन पर किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रही है।

विश्व नारियल दिवस पर छत्तीसगढ़ की यह कहानी बताती है कि खेती की संभावनाएं केवल भौगोलिक सीमाओं से तय नहीं होतीं। वैज्ञानिक तकनीक, उपयुक्त पौध सामग्री, सिंचाई प्रबंधन, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव मिले तो गैर-पारंपरिक क्षेत्र भी किसी फसल की नई पहचान बना सकते हैं। कोंडागांव इसी बदलाव की एक महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने आया है।

cg24x7
Author: cg24x7

Spread the love