डायबिटीज के जिद्दी घावों के इलाज में बड़ी उम्मीद: छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिकों ने खोजा प्राकृतिक यौगिक, संक्रमण रोकने में मिली सफलता

भिलाई। डायबिटीज के मरीजों के पैरों में बनने वाले लंबे समय तक न भरने वाले घाव, कैथेटर से होने वाले संक्रमण और फंगस-बैक्टीरिया के संयुक्त संक्रमण के उपचार में जल्द ही नई उम्मीद जग सकती है। चिकित्सा शोध में एक ऐसे प्राकृतिक यौगिक की पहचान की गई है, जो संक्रमण फैलाने वाली मजबूत जैविक परत (बायोफिल्म) बनने से रोकने में प्रभावी पाया गया है। प्रारंभिक शोध में यह यौगिक संक्रमण को नियंत्रित करने और घावों को तेजी से भरने में मददगार साबित हुआ है।

इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। शोध के परिणाम दुनिया की प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित जर्नल ऑफ एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित किए गए हैं। यह अध्ययन एनआईटी रायपुर, रूंगटा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी और पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से पूरा किया गया है।

होमोवेनिलिक एसिड पर केंद्रित रहा शोध

वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में होमोवेनिलिक एसिड (Homovanillic Acid-HVA) नामक प्राकृतिक यौगिक का परीक्षण किया। शोधकर्ताओं के अनुसार यह पदार्थ विशेष रूप से उन संक्रमणों के खिलाफ प्रभावी पाया गया, जिनमें फंगस और बैक्टीरिया मिलकर संक्रमण की एक मजबूत सुरक्षात्मक परत (बायोफिल्म) बना लेते हैं।

चिकित्सा विज्ञान में ऐसे मिश्रित संक्रमणों को सबसे जटिल और उपचार के लिए चुनौतीपूर्ण माना जाता है, क्योंकि बायोफिल्म बनने के बाद सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं का प्रभाव काफी कम हो जाता है।

एनआईटी रायपुर में हुई शुरुआती रिसर्च

शोध की शुरुआत एनआईटी रायपुर की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में की गई। यहां वैज्ञानिकों ने कैंडिडा एल्बिकंस (Candida albicans) नामक फंगस और स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) नामक बैक्टीरिया पर एचवीए के प्रभाव का अध्ययन किया।

विभिन्न प्रयोगों और वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया कि एचवीए इन दोनों सूक्ष्मजीवों द्वारा बनाई जाने वाली बायोफिल्म को बनने से रोकता है। इससे संक्रमण की पकड़ कमजोर हो जाती है और उसके फैलने की क्षमता भी काफी घट जाती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यही बायोफिल्म लंबे समय तक घावों के न भरने और संक्रमण के लगातार बने रहने का प्रमुख कारण होती है।

संक्रमित घावों पर जेल के परीक्षण में मिले उत्साहजनक नतीजे

प्रयोगशाला में सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद शोध का अगला चरण रूंगटा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च में पूरा किया गया।

यहां वैज्ञानिकों ने एचवीए आधारित विशेष जेल तैयार कर संक्रमित घाव वाले चूहों पर उसका परीक्षण किया। अध्ययन के दौरान पाया गया कि उपचार शुरू होने के बाद घावों की सूजन तेजी से कम होने लगी। संक्रमण नियंत्रित हुआ और 14 दिनों के भीतर घाव तेजी से भरने लगे।

शोध में यह भी देखा गया कि उपचार के दौरान नई त्वचा बनने की प्रक्रिया सामान्य की तुलना में अधिक प्रभावी रही।

शोध के अंतिम चरण में पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के विशेषज्ञों ने माइक्रोस्कोपिक परीक्षणों के माध्यम से उपचार के परिणामों का मूल्यांकन किया।

जांच में पुष्टि हुई कि एचवीए आधारित उपचार के बाद त्वचा का पुनर्निर्माण तेज गति से हो रहा था तथा संक्रमण का स्तर पहले की तुलना में काफी कम पाया गया।

इस दौरान रूंगटा इंटरनेशनल स्किल्स यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने अध्ययन की रूपरेखा तैयार करने, आंकड़ों का विश्लेषण करने और शोध को अंतिम वैज्ञानिक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फंगस और बैक्टीरिया की खतरनाक साझेदारी को तोड़ता है एचवीए

शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी रहा कि होमोवेनिलिक एसिड फंगस और बैक्टीरिया के बीच बनने वाले जैविक गठजोड़ को तोड़ देता है। यही गठजोड़ संक्रमण को लंबे समय तक जीवित रखता है और उपचार को कठिन बना देता है।

डायबिटिक फुट, पुराने घाव, कैथेटर से होने वाले संक्रमण और अस्पतालों में होने वाले कई जिद्दी संक्रमणों में यही समस्या सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। एचवीए इस समस्या को शुरुआती स्तर पर नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।

अब होगा इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह शोध प्रायोगिक स्तर पर सफल हुआ है। अभी तक इसके परीक्षण प्रयोगशाला और पशु मॉडल तक सीमित हैं। अगला महत्वपूर्ण चरण मानवों पर क्लिनिकल ट्रायल का होगा।

यदि क्लिनिकल ट्रायल में भी समान रूप से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं, तो भविष्य में एचवीए आधारित दवा या औषधीय जेल विकसित की जा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में डायबिटिक फुट, लंबे समय तक न भरने वाले घाव, कैथेटर संक्रमण और अस्पतालों में होने वाले जटिल संक्रमणों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे एंटीबायोटिक दवाओं पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

इन वैज्ञानिकों ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

इस शोध को सफल बनाने में रूंगटा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के फार्मेसी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय गुप्ता, एनआईटी रायपुर की डॉ. प्रतिमा गुप्ता तथा डॉ. अनमोल कुलश्रेष्ठ की प्रमुख भूमिका रही। तीनों संस्थानों के वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुआ और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह तकनीक अभी शोध के चरण में है। मानवों पर परीक्षण और नियामकीय स्वीकृतियों के बाद ही इसे नियमित चिकित्सा उपचार का हिस्सा बनाया जा सकेगा।

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Author: cg24x7

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