संभावित अल-नीनो पर छत्तीसगढ़ सरकार का अलर्ट, किसानों के लिए जारी की एडवाइजरी; धान की जगह दलहन-तिलहन बोने पर देगी 15 हजार रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन

बलरामपुर। संभावित अल-नीनो की स्थिति और वर्ष 2026 में मानसून के कमजोर रहने की आशंका को देखते हुए छत्तीसगढ़ के कृषि विभाग ने किसानों के लिए विस्तृत कृषि एडवाइजरी जारी की है। विभाग ने किसानों से मौसम आधारित कृषि प्रबंधन अपनाने, जल संरक्षण पर विशेष ध्यान देने और कम पानी वाली फसलों की खेती को बढ़ावा देने की अपील की है। साथ ही राज्य सरकार की कृषक उन्नति योजना के तहत धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, मक्का अथवा अन्य वैकल्पिक फसल लेने वाले किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान भी बताया गया है।

कृषि विभाग का कहना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती की जाए तो संभावित कम वर्षा और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी फसल उत्पादन को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

मानसून में देरी और कम वर्षा की आशंका

कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2026 में संभावित अल-नीनो प्रभाव के कारण मानसून के आगमन में देरी, सामान्य से कम वर्षा तथा कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनने की संभावना व्यक्त की जा रही है। ऐसे में किसानों को पारंपरिक खेती के बजाय मौसम की स्थिति के अनुरूप फसल चयन और कृषि तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर कृषि प्रबंधन अपनाने से उत्पादन में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बारिश से पहले खेतों की तैयारी पूरी करने की सलाह

विभाग ने किसानों से अपील की है कि वर्षा शुरू होने से पहले खेतों की गहरी जुताई, मेड़ों की मरम्मत, खरपतवार की सफाई तथा भूमि की समुचित तैयारी का कार्य पूरा कर लें। इससे वर्षा का पानी अधिक मात्रा में खेतों में संरक्षित रहेगा और मिट्टी में नमी बनी रहेगी।

इसके साथ ही किसानों को कम एवं मध्यम अवधि में पकने वाली फसल किस्मों का चयन करने की सलाह दी गई है ताकि अनिश्चित मानसून की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

डीएसआर तकनीक अपनाने पर जोर

कृषि विभाग ने धान की खेती करने वाले किसानों को डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) यानी धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने की सलाह दी है।

विभाग के अनुसार इस तकनीक से लगभग 20 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इसके अलावा खेती की लागत कम आती है और फसल पारंपरिक विधि की तुलना में 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को समय और संसाधनों दोनों की बचत होती है।

ऊंची भूमि पर धान की बजाय दलहन और तिलहन उगाने की सलाह

एडवाइजरी में कहा गया है कि ऊंची भूमि पर धान की खेती करने के बजाय कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों को प्राथमिकता दी जाए। किसानों को अरहर, मूंग, उड़द, तिल, सोयाबीन और मूंगफली जैसी दलहनी एवं तिलहनी फसलों की खेती करने की सलाह दी गई है।

वहीं धान वाले खेतों में मजबूत मेड़बंदी कर वर्षा जल का अधिकतम संरक्षण करने पर भी जोर दिया गया है।

विभाग ने कतार पद्धति से बुवाई करने की सलाह देते हुए कहा है कि इससे खरपतवार नियंत्रण आसान होता है, पौधों का विकास बेहतर होता है तथा मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है।

बीजोपचार और जैव उर्वरकों का करें उपयोग

कृषि विभाग ने सभी किसानों को बुवाई से पहले बीजोपचार अनिवार्य रूप से करने की सलाह दी है। विशेष रूप से दलहनी फसलों में राइजोबियम सहित जैव उर्वरकों के उपयोग पर बल दिया गया है, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है।

यदि 15 जुलाई तक बीजों का अंकुरण नहीं होता है तो पुनः बुवाई करने की सलाह दी गई है। साथ ही सामान्य से लगभग 10 प्रतिशत अधिक बीज का उपयोग करने की भी अनुशंसा की गई है।

विभाग के अनुसार जुलाई के अंत तक मूंग और उड़द की बुवाई पूरी कर लेनी चाहिए, जबकि अगस्त माह में तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि वाली अरहर की बुवाई उपयुक्त रहेगी। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद खरपतवार नियंत्रण करना भी आवश्यक बताया गया है।

सूखे से बचाव के लिए मल्चिंग और जल संरक्षण पर जोर

संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को मल्चिंग तकनीक अपनाने की सलाह दी है। इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और सिंचाई की आवश्यकता कम होती है।

इसके अलावा गांवों के नालों पर अस्थायी अवरोध बनाकर वर्षा जल रोकने, तालाबों, कुओं और अन्य जल संरचनाओं में अधिक से अधिक पानी संग्रहित करने की अपील की गई है।

जहां संभव हो, वहां ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है, जिससे सीमित पानी का अधिकतम उपयोग किया जा सके।

कम वर्षा में उर्वरकों का संतुलित उपयोग जरूरी

कृषि विशेषज्ञों ने कम वर्षा की स्थिति में नत्रजन उर्वरकों का सीमित उपयोग करने की सलाह दी है। आवश्यकता पड़ने पर 2 प्रतिशत यूरिया घोल का पत्तियों पर छिड़काव लाभकारी रहेगा।

इसी प्रकार दलहनी एवं तिलहनी फसलों में बुवाई के लगभग एक माह बाद 2 प्रतिशत डीएपी घोल का पर्णीय छिड़काव करने की सलाह दी गई है, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है।

कृषि आकस्मिक योजना का मिलेगा लाभ

संभावित कम वर्षा को देखते हुए कृषि विभाग ने कृषि आकस्मिक योजना लागू की है। इसके तहत किसानों को धान पर निर्भरता कम करते हुए दलहन, तिलहन, मक्का तथा अन्य कम पानी वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

विभाग ने बताया कि राज्य सरकार की कृषक उन्नति योजना के अंतर्गत यदि किसान धान की जगह दलहन, तिलहन, मक्का या अन्य वैकल्पिक फसल लगाते हैं तो उन्हें 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी। इसका उद्देश्य जल संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाना और खेती को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाना है।

धान बोना है तो इन किस्मों का करें चयन

यदि किसान धान की खेती ही करना चाहते हैं तो कृषि विभाग ने शीघ्र पकने वाली किस्मों आईआर-64 और एमटीयू-1010 का चयन करने की सलाह दी है।

विभाग का कहना है कि इन किस्मों के साथ डीएसआर तकनीक, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर खरपतवार नियंत्रण अपनाने से कम वर्षा की स्थिति में भी अपेक्षाकृत बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

मौसम की जानकारी लेकर करें खेती

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे मौसम पूर्वानुमान के आधार पर खेती की योजना बनाएं। साथ ही फसल विविधीकरण अपनाकर जोखिम कम करें, जल संरक्षण को प्राथमिकता दें और किसी भी तकनीकी समस्या की स्थिति में निकटतम कृषि कार्यालय अथवा कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें।

विभाग का कहना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन, आधुनिक सिंचाई तकनीकों और समय पर लिए गए निर्णयों के माध्यम से कम वर्षा की स्थिति में भी फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है तथा किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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Author: cg24x7

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