नई दिल्ली। डिजिटल दौर में बच्चों की इंटरनेट और सोशल मीडिया तक बढ़ती पहुंच अब केवल अभिभावकों की चिंता नहीं रह गई है, बल्कि यह गंभीर कानूनी और नीतिगत मुद्दा बनती जा रही है। कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद साइबर बुलिंग, अश्लील एवं यौन सामग्री, ऑनलाइन शोषण, डेटा के दुरुपयोग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से बचाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच प्रतिबंधित करने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। याचिका में केंद्र सरकार को इस दिशा में जरूरी कानूनी और नीतिगत कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भले ही न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित करते हों, लेकिन उम्र की वास्तविक जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चे आसानी से गलत जन्मतिथि दर्ज करके इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं।
PIL में केंद्र सरकार से क्या मांग की गई?
दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से दूर रखने के लिए एक प्रभावी कानूनी ढांचा तैयार किया जाए।
याचिका में विशेष रूप से अनिवार्य आयु सत्यापन (Age Verification) व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खाता बनाने वाला व्यक्ति वास्तव में निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा पूरी करता है या नहीं।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक केवल प्लेटफॉर्म की ओर से आयु सीमा निर्धारित कर देना पर्याप्त नहीं है। जब तक उम्र की विश्वसनीय तरीके से पुष्टि नहीं होगी, तब तक कम उम्र के बच्चे प्रतिबंधों को आसानी से दरकिनार कर सकते हैं।
बच्चों के सामने कौन-कौन से ऑनलाइन खतरे?
याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े कई गंभीर जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से साइबर बुलिंग, अनुचित और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री तक पहुंच, ऑनलाइन ग्रूमिंग, शोषण, डेटा गोपनीयता का उल्लंघन और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव शामिल हैं।
कम उम्र के बच्चे इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री की विश्वसनीयता और जोखिम को वयस्कों की तरह समझने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में एल्गोरिदम आधारित कंटेंट की लगातार पहुंच उन्हें ऐसी सामग्री तक भी ले जा सकती है, जो उनकी उम्र के लिहाज से अनुपयुक्त हो।
याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह की सामग्री के अनियंत्रित संपर्क और उससे उत्पन्न जोखिमों का संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी है।
तीन साल के बच्चे की मां और बाल रोग विशेषज्ञ ने दाखिल की याचिका
यह PIL तीन साल के बच्चे की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता की ओर से दायर की गई है।
याचिका में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को केवल परिवार की जिम्मेदारी मानने के बजाय सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने पर भी जोर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने के लिए तकनीकी कंपनियों और सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे।
दिल्ली हाईकोर्ट में क्या हुआ?
यह मामला शुरुआत में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष आया था। हालांकि, बाद में न्यायमूर्ति तेजस कारिया ने इस PIL की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को ऐसी पीठ के समक्ष होगी, जिसमें न्यायमूर्ति कारिया शामिल नहीं होंगे।
फिलहाल हाईकोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। आगे की सुनवाई में अदालत केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांग सकती है। यही कारण है कि इस मामले को बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और भारत की भविष्य की डिजिटल नीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है यही मुद्दा
13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग पहली बार अदालत के सामने नहीं आई है। अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट में भी इसी तरह की जनहित याचिका दायर की गई थी।
उस मामले में न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने इस मुद्दे पर न्यायिक हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने इसे मुख्य रूप से नीति निर्माण का विषय माना और कहा था कि इस संबंध में फैसला संसद तथा सरकार को लेना चाहिए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं था कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के मुद्दे को महत्वहीन माना गया। बल्कि इससे यह संकेत मिला कि सोशल मीडिया की आयु सीमा और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा जैसे व्यापक विषय पर कानून या नीति बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी विधायिका और कार्यपालिका की है।
दुनिया के दूसरे देशों में क्या नियम हैं?
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया के कई देशों में पहले से कानून और नियामकीय व्यवस्था मौजूद है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बच्चों की डिजिटल गतिविधियों, डेटा और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग स्तर पर नियम बनाए गए हैं।
अमेरिका में COPPA
अमेरिका में Children’s Online Privacy Protection Act (COPPA) के तहत 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह और उपयोग को लेकर विशेष प्रावधान हैं। कुछ परिस्थितियों में बच्चों का डेटा एकत्र करने से पहले अभिभावकीय सहमति की आवश्यकता होती है।
यूरोपीय संघ में GDPR
यूरोपीय संघ के General Data Protection Regulation (GDPR) में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान हैं। बच्चों के डेटा के इस्तेमाल को लेकर कंपनियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं।
ब्रिटेन में Online Safety Act
ब्रिटेन का Online Safety Act भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने पर केंद्रित है। इसमें डिजिटल सेवाओं और प्लेटफॉर्म को बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाने के लिए जिम्मेदार बनाने पर जोर दिया गया है।
ऑस्ट्रेलिया में भी सख्ती की दिशा
ऑस्ट्रेलिया ने भी हाल के वर्षों में कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में सख्त कदम उठाए हैं। इससे स्पष्ट है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा अब दुनिया के कई देशों में सार्वजनिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
भारत में अभी स्थिति क्या है?
भारत में बच्चों के डेटा और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर स्पष्ट और व्यापक वैधानिक प्रतिबंध अभी लागू नहीं है।
यही वजह है कि दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल PIL को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि अदालत इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगती है या सरकार को नीति बनाने पर विचार करने के लिए कहती है, तो आने वाले समय में भारत में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर नए नियमों की बहस तेज हो सकती है।
Gen Alpha की डिजिटल सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण?
आज की नई पीढ़ी बचपन से ही स्मार्टफोन, इंटरनेट, वीडियो प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के संपर्क में आ रही है। इस पीढ़ी को अक्सर Gen Alpha कहा जाता है। ऐसे में डिजिटल दुनिया से बच्चों का जुड़ाव रोकना आसान या व्यावहारिक समाधान नहीं है। असली चुनौती उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराने की है।
विशेषज्ञों और अभिभावकों के सामने सवाल यह है कि बच्चों को इंटरनेट की उपयोगी सुविधाओं से वंचित किए बिना उन्हें हानिकारक सामग्री, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और डेटा के दुरुपयोग से कैसे बचाया जाए।
इसी संदर्भ में आयु सत्यापन, अभिभावकीय नियंत्रण, सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग्स, कंटेंट मॉडरेशन और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सिर्फ उम्र सीमा तय करना पर्याप्त नहीं
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित होने के बावजूद यदि उसकी प्रभावी जांच नहीं होती, तो नियम का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका का एक प्रमुख पहलू प्रभावी आयु सत्यापन व्यवस्था है।
हालांकि, आयु सत्यापन के साथ निजता का सवाल भी जुड़ा हुआ है। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, उसमें उनकी व्यक्तिगत जानकारी के अनावश्यक संग्रह और दुरुपयोग से बचाव भी सुनिश्चित करना होगा।
यानी भविष्य की किसी भी व्यवस्था में दो महत्वपूर्ण लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना होगा—बच्चों की सुरक्षा और उनकी डिजिटल निजता।
आगे क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को होने की बात सामने आई है। फिलहाल यह मामला विचाराधीन है और अदालत का अंतिम रुख सामने आना बाकी है।
यदि अदालत केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगती है या इस विषय पर नीतिगत कदमों की आवश्यकता पर कोई टिप्पणी करती है, तो इसका प्रभाव केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे देश में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल, आयु सत्यापन और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है।
निष्कर्ष
13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की मांग अब भारत में एक महत्वपूर्ण कानूनी और नीतिगत बहस का हिस्सा बन चुकी है। एक ओर बच्चों को साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री, ऑनलाइन ग्रूमिंग, शोषण और डेटा दुरुपयोग जैसे खतरों से बचाने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर आयु सत्यापन के दौरान बच्चों की निजता और डिजिटल अधिकारों की रक्षा भी जरूरी होगी।
दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित यह PIL आने वाले समय में भारत की बाल डिजिटल सुरक्षा नीति के लिए महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। अदालत का अंतिम निर्णय चाहे जो हो, इस मामले ने एक बुनियादी सवाल जरूर सामने ला दिया है—बच्चों को डिजिटल दुनिया से जोड़ते हुए उन्हें सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी और कितनी होनी चाहिए?
Author: cg24x7



