वॉशिंगटन/इस्लामाबाद। ईरान को चीन में निर्मित मिसाइलों की कथित सप्लाई को लेकर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के बीच नया विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ईरान को बड़ी संख्या में शोल्डर-फायर्ड एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम उपलब्ध कराने की तैयारी में है और इन हथियारों को पाकिस्तान के रास्ते ईरान तक पहुंचाए जाने की योजना बनाई गई है। हालांकि, पाकिस्तान ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
इस मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन द्वारा ईरान को हथियार दिए जाने की खबर पर नाराजगी जताई है। ट्रंप ने कहा कि यदि चीन ईरान को हथियार उपलब्ध कराता है तो उन्हें इससे निराशा होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान को हथियार सप्लाई करने वाले देशों से होने वाले आयात पर अमेरिका भारी टैरिफ लगाने पर विचार कर सकता है।
दूसरी ओर, चीन ने ईरान को कथित मिसाइल सप्लाई से जुड़ी रिपोर्टों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें ‘पूरी तरह से बेबुनियाद’ बताया है। पाकिस्तान की ओर से भी कथित हथियार ट्रांजिट रूट में अपनी भूमिका से इनकार किया गया है।
क्या है चीन-ईरान की कथित मिसाइल डील?
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान को चीन निर्मित शोल्डर-फायर्ड एयर डिफेंस मिसाइल लॉन्चर की बड़ी खेप उपलब्ध कराने की कथित योजना सामने आई है। इन हथियारों को मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम यानी MANPADS की श्रेणी से जोड़ा जा रहा है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में मामले से परिचित सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि ईरान को आने वाले समय में करीब 300 से 400 मिसाइलों की खेप मिल सकती है। रिपोर्ट में कथित डील की कीमत अरबों डॉलर में बताई गई है।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है और चीन ने ऐसी किसी हथियार डील की खबर को खारिज किया है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में यह अंतर महत्वपूर्ण है कि कौन-सी बात आधिकारिक रूप से पुष्ट है और कौन-सी खुफिया या सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट का हिस्सा है।
ट्रंप ने क्यों जताई ‘हैरानी’?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जब ईरान को चीन निर्मित शोल्डर-फायर मिसाइलों की संभावित सप्लाई से जुड़ी खबरों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसे ‘हैरान करने वाली’ स्थिति बताया।
ट्रंप ने कहा कि यदि चीन वास्तव में ईरान को हथियार उपलब्ध करा रहा है तो यह उनके लिए निराशाजनक होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें पहले यह आश्वासन दिया गया था कि चीन इस तरह की गतिविधि में शामिल नहीं होगा।
ट्रंप का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही व्यापार, तकनीक और भू-राजनीतिक मुद्दों पर तनाव मौजूद है। ईरान को हथियारों की कथित सप्लाई का मामला इस तनाव को और बढ़ा सकता है।
ईरान को हथियार देने वाले देशों पर टैरिफ की चेतावनी
ट्रंप ने उन देशों पर संभावित आर्थिक कार्रवाई का भी संकेत दिया है जो ईरान को हथियारों की आपूर्ति में मदद करते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ऐसे देशों से होने वाले आयात पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी का उल्लेख किया।
यदि इस तरह का कदम वास्तव में उठाया जाता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंध भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका किसी विशेष देश के खिलाफ किस प्रकार की कार्रवाई करेगा और कथित हथियार आपूर्ति के आरोपों को साबित करने के लिए क्या प्रमाण सार्वजनिक किए जाएंगे।
शी जिनपिंग के आश्वासन का ट्रंप ने किया जिक्र
ट्रंप ने कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनसे कथित तौर पर स्पष्ट रूप से कहा था कि चीन ईरान को इस तरह के हथियार उपलब्ध कराने में शामिल नहीं होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि शी जिनपिंग के साथ उनकी भविष्य में मुलाकात हो सकती है। ऐसे में ईरान को हथियारों की कथित सप्लाई का मुद्दा अमेरिका-चीन वार्ता में भी उठ सकता है।
ट्रंप इससे पहले भी यह आशंका जाहिर कर चुके हैं कि ईरान से जुड़े किसी संघर्ष के दौरान चीन तेहरान को सैन्य या तकनीकी मदद दे सकता है।
चीन ने क्या कहा?
चीन ने ईरान को कथित रूप से मिसाइलों की आपूर्ति किए जाने संबंधी रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने रिपोर्टों को ‘पूरी तरह से बेबुनियाद’ बताते हुए कहा है कि चीन हमेशा शांति को बढ़ावा देने और संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में काम करता रहा है।
बीजिंग का रुख यह है कि वह क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने के बजाय बातचीत और राजनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है।
इससे पूरे मामले में दो अलग-अलग दावे सामने आते हैं—एक तरफ सूत्रों और खुफिया जानकारी पर आधारित हथियार सप्लाई की रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चीन का आधिकारिक खंडन है।
पाकिस्तान पर क्यों उठे सवाल?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन से ईरान तक कथित हथियार पहुंचाने के लिए पाकिस्तान को संभावित ट्रांजिट रूट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
बताया गया है कि हथियारों को पहले चीन के पश्चिमी क्षेत्र स्थित उरुमकी से विमान के जरिए लाया जा सकता है। इसके बाद कथित तौर पर पाकिस्तान के रास्ते उन्हें ईरान तक पहुंचाने की योजना होने की बात सामने आई।
रिपोर्ट में संभावित रूप से सड़क और हवाई मार्ग, दोनों विकल्पों का उल्लेख किया गया है।
यदि ऐसा कोई रूट वास्तव में इस्तेमाल होता है, तो पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे मामले में बेहद संवेदनशील हो सकती है, क्योंकि इससे एक ओर अमेरिका के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं और दूसरी ओर चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी भी सवालों के घेरे में आ सकती है।
पाकिस्तान ने आरोपों को किया खारिज
हालांकि, पाकिस्तान ने कथित हथियार ट्रांजिट में अपनी भूमिका से साफ इनकार किया है। पाकिस्तान की सेना के जनसंपर्क विभाग ISPR ने इन दावों को झूठा बताया है।
पाकिस्तान का कहना है कि ईरान को कथित चीनी हथियारों की सप्लाई या उनके लिए पाकिस्तान को ट्रांजिट रूट के तौर पर इस्तेमाल किए जाने से उसका कोई संबंध नहीं है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान वास्तव में किसी कथित मिसाइल डील का हिस्सा है। उपलब्ध जानकारी में पाकिस्तान की भूमिका मुख्य रूप से एक रिपोर्ट में लगाए गए आरोप और उसके बाद आए आधिकारिक खंडन के रूप में सामने आती है।
अमेरिका-चीन संबंधों पर पड़ सकता है असर
यदि भविष्य में ईरान को चीनी हथियारों की आपूर्ति की पुष्टि होती है, तो इसका असर अमेरिका-चीन संबंधों पर पड़ना तय माना जा सकता है। दोनों देशों के बीच पहले से ही व्यापार और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को लेकर तनाव है।
अमेरिका ईरान पर लंबे समय से व्यापक प्रतिबंध लागू करता रहा है और तेहरान की सैन्य क्षमताओं को लेकर वाशिंगटन की चिंता बनी हुई है। ऐसे में ईरान की वायु रक्षा क्षमता बढ़ाने वाली किसी भी बड़ी विदेशी सैन्य सहायता को अमेरिका गंभीरता से ले सकता है।
दूसरी ओर, चीन ईरान के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखता आया है। यही कारण है कि ईरान से जुड़ा कोई भी सैन्य समझौता अमेरिका और चीन के बीच व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन सकता है।
ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
शोल्डर-फायर्ड एयर डिफेंस सिस्टम ऐसे हथियार होते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत छोटे दल द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है और इनका उद्देश्य कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों या हेलीकॉप्टरों जैसे हवाई लक्ष्यों का मुकाबला करना होता है।
यदि ईरान को आधुनिक और बड़ी संख्या में ऐसे सिस्टम उपलब्ध होते हैं, तो इससे उसकी वायु रक्षा क्षमता मजबूत हो सकती है। विशेष रूप से किसी संभावित सैन्य टकराव की स्थिति में ऐसे हथियार रणनीतिक महत्व रखते हैं।
हालांकि, किसी विशेष प्रणाली की क्षमता, उसकी वास्तविक संख्या और ईरान को उसकी संभावित डिलीवरी की पुष्टि के बिना इसके सैन्य प्रभाव का आकलन सीमित रहेगा।
क्या पाकिस्तान पर भी लग सकता है अमेरिकी टैरिफ?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है। ट्रंप ने हथियार सप्लाई करने वाले देशों पर टैरिफ की चेतावनी दी है, लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ किसी विशिष्ट कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
चूंकि पाकिस्तान ने कथित हथियार आपूर्ति में अपनी भूमिका से इनकार किया है, इसलिए उसके खिलाफ किसी संभावित अमेरिकी कार्रवाई के लिए पहले यह स्थापित करना जरूरी होगा कि पाकिस्तान ने वास्तव में हथियारों के ट्रांजिट में सहायता की या नहीं।
इसलिए फिलहाल पाकिस्तान पर टैरिफ लगने की संभावना को एक संभावित परिदृश्य के तौर पर ही देखा जा सकता है, न कि तय अमेरिकी फैसला माना जा सकता है।
मामला अभी आरोप, रिपोर्ट और खंडन के बीच
चीन-ईरान कथित मिसाइल डील का पूरा घटनाक्रम अभी मुख्य रूप से रिपोर्टों, सूत्रों के दावों और संबंधित देशों के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। चीन ने हथियार सप्लाई के आरोपों को खारिज किया है और पाकिस्तान ने भी ट्रांजिट रूट में अपनी भूमिका से इनकार किया है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि क्या अमेरिका इस मामले में कोई ठोस खुफिया या अन्य प्रमाण सार्वजनिक करता है और क्या चीन या पाकिस्तान के खिलाफ कोई औपचारिक कदम उठाया जाता है।
फिलहाल इतना जरूर है कि ईरान को कथित चीनी मिसाइल सप्लाई का मामला अमेरिका-चीन संबंधों, पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति और पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था—तीनों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
Author: cg24x7



