
सावन अमावस्या पर मनाया जाने वाला हरेली तिहार कृषि संस्कृति, पशुधन के सम्मान, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारंपरिक खेलों की जीवंत विरासत को संजोए हुए है।
(श्री धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क के आलेख पर आधारित)
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी हरियाली, वन संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और उत्सवधर्मी जीवनशैली से भी है। यहां के लोक-पर्व प्रकृति और मनुष्य के बीच सदियों से चले आ रहे आत्मीय संबंध के जीवंत प्रतीक हैं। इन्हीं लोक-पर्वों की श्रृंखला का पहला और प्रमुख पर्व है ‘हरेली तिहार’।
सावन माह की अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला हरेली तिहार छत्तीसगढ़ के कृषि प्रधान समाज की जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। खेतों में हरियाली छाने, बारिश के आगमन और कृषि कार्यों के महत्वपूर्ण चरण पूरे होने के साथ यह पर्व किसानों के लिए प्रकृति, कृषि उपकरणों और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर बनता है।
हरेली केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं है। यह किसान, खेत, हल-बैल, औजार, प्रकृति, लोकखेल, खान-पान और सामुदायिक जीवन को एक सूत्र में बांधने वाला लोक उत्सव है।
‘हरेली’ नाम में ही छिपा है हरियाली का संदेश
‘हरेली’ शब्द का संबंध ‘हरियाली’ से माना जाता है। सावन में जब बारिश के बाद खेत-खलिहान, पेड़-पौधे और गांव की धरती हरे रंग की चादर ओढ़ लेती है, तब छत्तीसगढ़ का किसान इस प्राकृतिक बदलाव का स्वागत हरेली के रूप में करता है।
छत्तीसगढ़ में इसे पहला तिहार भी कहा जाता है। इसके बाद आने वाले भोजली, पोला, तीजा, नवाखाई सहित अनेक लोकपर्व छत्तीसगढ़ी लोकजीवन को अलग-अलग रंगों से भरते हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रत्येक माह और ऋतु का अपना लोक उत्सव है। ये पर्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लोगों को मिल-बैठने, खुशियां बांटने, मनोरंजन करने और अपनी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी देते हैं।
हरेली में प्रकृति का हरापन लोकजीवन के उल्लास में भी दिखाई देता है। यही कारण है कि हरेली, भोजली, जंवारा और बसंत पंचमी जैसे पर्वों में छत्तीसगढ़ की प्रकृति और संस्कृति का अनूठा मेल देखने को मिलता है।
कृषि उपकरणों की पूजा, किसान के श्रम को सम्मान
हरेली का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कृषि उपकरणों की पूजा है। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती का केंद्रीय स्थान रहा है और कृषि कार्य में उपयोग होने वाले औजार किसान के लिए केवल उपकरण नहीं, बल्कि उसके श्रम और आजीविका के साथी हैं।
हरेली के दिन किसान अपने कृषि उपकरणों को साफ-सुथरा कर उनकी पूजा करते हैं। हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, बसुला, हथौड़ी, आरी, खुर्पी, छूरा सहित खेती और अन्य कामों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को धोकर साफ किया जाता है।
पूजा के लिए स्वच्छ मिट्टी का आसन तैयार किया जाता है। इसके बाद चंदन, फूल, धूप-दीप, चावल आदि से पूजा की जाती है। पारंपरिक पकवानों का भोग लगाया जाता है और श्रीफल अर्पित किया जाता है।
इस पूजा के पीछे मूल भाव है—कृषि कार्य में सहयोग देने वाले औजारों के प्रति कृतज्ञता।
किसान अपने कृषि उपकरणों को विश्राम देने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा निभाता है। यह परंपरा किसान के श्रम, धरती और कृषि साधनों के बीच गहरे संबंध को अभिव्यक्त करती है।
बैल और गाय हैं किसान के सच्चे साथी
हरेली तिहार में पशुधन के सम्मान की भी महत्वपूर्ण परंपरा है। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि व्यवस्था में बैल किसान के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में रहे हैं। जुताई, ढुलाई और कृषि सामग्री के परिवहन में बैलों की भूमिका ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है।
हरेली के दिन गाय और बैलों को नहलाया-धुलाया जाता है। उन्हें सजाया जाता है और उनकी पूजा कर आरती उतारी जाती है। पशुओं को पारंपरिक रूप से पौष्टिक मिश्रण और औषधीय सामग्री खिलाने की परंपरा भी रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अरण्ड और खम्हार के पत्तों सहित स्थानीय औषधीय वनस्पतियों का उपयोग पशुओं के स्वास्थ्य की पारंपरिक देखभाल में किया जाता रहा है। इनके साथ नमक और चावल अथवा गेहूं के मिश्रण का उपयोग किया जाता है।
इन लोक परंपराओं में ग्रामीण समाज का पशुधन के स्वास्थ्य के प्रति अनुभवजन्य ज्ञान भी दिखाई देता है। हरेली इस बात की याद दिलाती है कि किसान की समृद्धि केवल खेत और फसल से नहीं, बल्कि स्वस्थ पशुधन से भी जुड़ी है।
गेड़ी: हरेली की सबसे पहचान वाली परंपरा
हरेली तिहार का नाम आते ही छत्तीसगढ़ की एक खास लोक परंपरा याद आती है—गेड़ी चढ़ना।
बांस के मजबूत डंडों और पैरों के लिए बनाए गए बांस के पायों से तैयार गेड़ी पर चढ़कर बच्चे, युवा और ग्रामीण पूरे उत्साह के साथ खेलते हैं। बारिश के मौसम में जब गांव की गलियां और रास्ते कीचड़ एवं पानी से भर जाते थे, तब ऊंचाई पर चलने के लिए गेड़ी उपयोगी साधन भी रही होगी। समय के साथ यह उपयोगी साधन लोक मनोरंजन और खेल का हिस्सा बन गया।
हरेली के अवसर पर गेड़ी दौड़ और गेड़ी से जुड़े अनेक पारंपरिक खेल आयोजित किए जाते हैं। बच्चे और युवा गेड़ी पर संतुलन बनाते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
छत्तीसगढ़ी लोकजीवन में गेड़ी केवल खेल नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और सामुदायिक आनंद का प्रतीक बन चुकी है।
नारियल फेंक से लेकर खो-खो और फुगड़ी तक
हरेली के दिन गांवों और शहरों में विभिन्न पारंपरिक खेलों और प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद गांव के चौक-चौराहों और मैदानों में युवाओं की टोलियां जुटती हैं।
कई स्थानों पर नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसके अलावा गेड़ी दौड़, खो-खो, फुगड़ी, बिल्लस, अत्ती-पत्ती और डंडा पचरंगा जैसे पारंपरिक खेल भी खेले जाते हैं।
गांव का गौठान, स्कूल का मैदान, चौक-चौराहा या सड़क किनारा—हरेली के दिन सामुदायिक उत्सव का केंद्र बन जाता है। रंग-बिरंगे परिधानों में ग्रामीणों की मौजूदगी और खेलों का उत्साह इस पर्व को जीवंत बना देता है।
इन खेलों का महत्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। ये बच्चों और युवाओं में शारीरिक क्षमता, संतुलन, प्रतिस्पर्धा, सहयोग और सामुदायिक भावना विकसित करने का माध्यम भी हैं।
नीम की पत्तियों से जुड़ी लोकमान्यता
हरेली के दिन घरों के मुख्य दरवाजों पर नीम की पत्तियां और शाखाएं लगाने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार इससे घर को बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियों और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।
कई स्थानों पर लोहार द्वारा घर के चौखट पर नीम की शाखाएं और लोहे की कीलें लगाने की परंपरा भी रही है।
इन परंपराओं में लोकविश्वास के साथ-साथ नीम के पारंपरिक औषधीय महत्व की छाप भी दिखाई देती है। ग्रामीण समाज ने अपने अनुभव के आधार पर नीम को स्वास्थ्य और स्वच्छता से जोड़ा और उसे लोकजीवन की अनेक परंपराओं में स्थान दिया।
हरेली के पकवानों में छत्तीसगढ़ी स्वाद
हरेली तिहार का आनंद पारंपरिक पकवानों के बिना अधूरा माना जाता है। इस अवसर पर घरों में विभिन्न प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं।
गुड़हा चीला, गुलगुला भजिया, अईरसा, चौसेला, बोबरा, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे पारंपरिक व्यंजन इस पर्व के खान-पान का हिस्सा हैं।
कृषि उपकरणों की पूजा के बाद उन्हें इन पकवानों का भोग लगाया जाता है। इसी तरह पशुधन की पूजा के दौरान भी परंपरागत रूप से विशेष आहार दिया जाता है।
इस तरह हरेली का भोजन भी स्थानीय कृषि, उपलब्ध सामग्री और छत्तीसगढ़ी पाक परंपरा से जुड़ा हुआ है।
लोकगीतों और सामुदायिक जीवन में हरेली की गूंज
हरेली केवल पूजा और खेल का दिन नहीं है। यह लोकगीतों, लोकभाषा और सामुदायिक सहभागिता को जीवित रखने वाला अवसर भी है।
गांवों में हरेली के अवसर पर लोकगीतों और पारंपरिक बोलियों की गूंज सुनाई देती है। इन गीतों में खेत, बारिश, हरियाली, पशुधन, परिवार और ग्रामीण जीवन की खुशियों की अभिव्यक्ति होती है।
माटी की सोंधी खुशबू, बारिश से धुली हरियाली और लोकगीतों की धुन मिलकर हरेली को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का एक विशिष्ट पर्व बनाती है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश
हरेली का सबसे बड़ा संदेश प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है। खेतों में फसल उगाने के लिए किसान बारिश और मिट्टी पर निर्भर है। खेती के काम में पशुधन और कृषि उपकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेली इन सभी के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देती है।
यह पर्व मनुष्य को यह भी याद दिलाता है कि प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों का संरक्षण और सम्मान आवश्यक है।
आज जब पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और जैव विविधता जैसे विषय वैश्विक चिंता के केंद्र में हैं, तब हरेली जैसी लोक परंपराओं में छिपा प्रकृति सम्मान का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
बदलते समय में पारंपरिक खेलों को बचाने की चुनौती
आधुनिक जीवनशैली, तकनीक और मनोरंजन के नए साधनों के विस्तार के साथ पारंपरिक खेलों का स्वरूप भी बदल रहा है। मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के दौर में गेड़ी, फुगड़ी, बिल्लस और अन्य ग्रामीण खेलों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौती बन गया है।
ऐसे में हरेली जैसे पर्व पारंपरिक खेलों को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं। इन खेलों से बच्चों और युवाओं को अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।
पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहित करने के प्रयासों के माध्यम से ग्रामीण खेल संस्कृति को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
हरेली: परंपरा से आधुनिकता तक का सांस्कृतिक सेतु
छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार हमें बताता है कि लोक संस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं है। वह वर्तमान को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए भविष्य को भी दिशा दे सकती है।
एक ओर हरेली किसान और उसके श्रम को सम्मान देती है, दूसरी ओर पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है। यह प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है तो दूसरी ओर सामुदायिक खेलों और लोक मनोरंजन की परंपरा को आगे बढ़ाती है।
छत्तीसगढ़ में हरेली के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश और पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहन जैसे प्रयासों से इस लोक विरासत को व्यापक पहचान देने की कोशिश की जा रही है।
हरियाली केवल खेतों में नहीं, जीवन में भी आए
हरेली का हरापन केवल खेतों और पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है। यह छत्तीसगढ़ी संस्कारों, परंपराओं और लोकजीवन की जीवंतता का भी प्रतीक है।
हरेली की कामना है कि खेतों में हरियाली रहे, पशुधन स्वस्थ रहे, किसान खुशहाल रहे और गांवों में सामुदायिक जीवन की परंपराएं मजबूत होती रहें।
माटी से जुड़े खेल जीवित रहें, लोकगीतों में छत्तीसगढ़ की सोंधी महक बनी रहे और नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझे—यही इस पर्व का व्यापक संदेश है।
हरेली का यह हरापन हर छत्तीसगढ़वासी के जीवन में बिखरे, निखरे और समृद्धि का आधार बने—इसी कामना के साथ हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, कृषि परंपरा और प्रकृति-प्रेम का एक अनुपम उत्सव बना हुआ है।
Author: cg24x7








