छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भू-विस्थापितों को राहत, अधिग्रहण के समय लागू पुनर्वास नीति से ही तय होगा SECL में रोजगार का हक

2009 में जमीन अधिग्रहित हुई तो 2012 की बाद की नीति के आधार पर रोजगार का दावा खारिज नहीं किया जा सकता; 2 एकड़ से कम जमीन वाले भू-विस्थापित को भी पुराने नियमों के तहत दावे पर विचार का निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से प्रभावित भू-विस्थापितों के रोजगार अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जमीन जिस समय अधिग्रहित की गई थी, उस समय प्रभावी पुनर्वास नीति के आधार पर ही उसके रोजगार के दावे का परीक्षण किया जाना चाहिए। बाद में लागू की गई नीति के आधार पर पहले से मौजूद अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

मामला एसईसीएल (South Eastern Coalfields Limited) की गेवरा परियोजना के विस्तार के लिए कोरबा जिले के कटघोरा तहसील अंतर्गत ग्राम नरईबोध में जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने एसईसीएल द्वारा 13 मई 2022 को जारी उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें नरईबोध निवासी लखनलाल राठौर के रोजगार संबंधी दावे को खारिज कर दिया गया था।

अदालत ने एसईसीएल को निर्देश दिया है कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के रोजगार के दावे पर उस समय लागू छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति के तहत नए सिरे से विचार कर उचित निर्णय ले।

2009 में हुआ था जमीन का अधिग्रहण

पूरा विवाद वर्ष 2009 में शुरू हुई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से संबंधित है। केंद्र सरकार ने एसईसीएल की गेवरा परियोजना के विस्तार के लिए कोल बेयरिंग एरिया एक्ट के तहत ग्राम नरईबोध की जमीन अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू की थी।

वर्ष 2009-10 में अधिनियम की धारा 4, 7 और 9 के तहत आवश्यक अधिसूचनाएं जारी की गई थीं। इस अधिग्रहण में याचिकाकर्ता लखनलाल राठौर की करीब 0.10 एकड़ जमीन भी शामिल थी।

उस समय छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति प्रभावी थी। इस नीति में भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवार के पात्र सदस्य को रोजगार दिए जाने का प्रावधान था।

जमीन अधिग्रहित होने के बाद लखनलाल राठौर ने इसी नीति के आधार पर एसईसीएल में रोजगार की मांग की।

2012 की नीति का हवाला देकर खारिज कर दिया गया दावा

याचिकाकर्ता के रोजगार के दावे पर बाद में एसईसीएल ने कोल इंडिया लिमिटेड की पुनर्वास नीति-2012 का हवाला दिया।

इस नीति के तहत दो एकड़ से कम भूमि वाले भू-विस्थापितों को रोजगार के लिए पात्र नहीं माना गया था। चूंकि लखनलाल राठौर की अधिग्रहित जमीन करीब 0.10 एकड़ थी, इसलिए एसईसीएल ने इसी आधार पर उनका रोजगार संबंधी दावा खारिज कर दिया।

एसईसीएल ने 13 मई 2022 को आदेश जारी कर उनका आवेदन निरस्त कर दिया था।

इसके बाद लखनलाल राठौर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एसईसीएल के इस आदेश को चुनौती दी।

याचिकाकर्ता ने 2017 के ‘प्यारेलाल बनाम SECL’ फैसले का दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शाश्वत गुप्ता ने हाईकोर्ट के वर्ष 2017 के प्यारेलाल बनाम एसईसीएल मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।

दलील दी गई कि जब याचिकाकर्ता की जमीन का अधिग्रहण वर्ष 2009-10 में किया गया था, उस समय छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति प्रभावी थी। इसलिए बाद में वर्ष 2012 में बनाई गई नई नीति को पिछली तारीख से लागू कर याचिकाकर्ता के रोजगार के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अधिग्रहण के समय जो नीति लागू थी, उसी के तहत उसके रोजगार संबंधी दावे पर विचार होना चाहिए।

SECL ने क्या दलील दी?

एसईसीएल की ओर से अधिवक्ता सुधीर कुमार बाजपेयी ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा।

एसईसीएल की ओर से कहा गया कि जिलास्तरीय पुनर्वास समिति की बैठक में कोल इंडिया की वर्ष 2012 की पुनर्वास नीति को लागू करने का निर्णय लिया गया था। इसी नीति के तहत दो एकड़ से कम जमीन वाले प्रभावितों को रोजगार देने का प्रावधान नहीं था।

एसईसीएल की ओर से यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता को अधिग्रहित जमीन का मुआवजा मिल चुका है और इसी आधार पर उसके रोजगार के दावे को स्वीकार नहीं किया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट के समक्ष पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्णय की स्थिति ने मामले की दिशा बदल दी।

2017 का हाईकोर्ट फैसला बना अहम आधार

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एसईसीएल के अधिवक्ता से प्यारेलाल मामले में वर्ष 2017 में दिए गए फैसले की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी मांगी।

एसईसीएल की ओर से यह स्वीकार किया गया कि वर्ष 2017 के उस फैसले को उच्चतर अदालत में चुनौती नहीं दी गई थी। यानी वह फैसला अंतिम हो चुका है।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने माना कि समान परिस्थितियों वाले भू-विस्थापितों के मामले में पहले से तय कानूनी सिद्धांत की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अधिग्रहण के समय लागू नीति ही रोजगार के दावे का आधार

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और प्रभावित व्यक्ति के रोजगार के अधिकार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि रोजगार के दावे का निर्धारण उस समय प्रभावी नीति के आधार पर किया जाना चाहिए, जब भूमि का अधिग्रहण हुआ था।

अर्थात, यदि भूमि का अधिग्रहण 2009 में हुआ और उस समय एक अलग पुनर्वास नीति लागू थी, तो बाद में 2012 में बनाई गई नीति के आधार पर उस व्यक्ति के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी माना कि बाद में लागू हुई नीति के जरिए पहले से अर्जित अधिकार को समाप्त करना उचित नहीं होगा।

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का भी संदर्भ

हाईकोर्ट ने अपने विचार में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के संदर्भ में पुनर्वास और रोजगार के अधिकार के महत्व को भी रेखांकित किया।

भूमि अधिग्रहण केवल जमीन के एक हिस्से को लेने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे प्रभावित परिवार की आजीविका और सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। ऐसे में पुनर्वास संबंधी नीति का उद्देश्य प्रभावित परिवारों को उचित राहत और पुनर्स्थापन उपलब्ध कराना है।

अदालत के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यही है कि बाद में बदली गई नीति के आधार पर पहले से मौजूद अधिकारों को समाप्त करने की कोशिश नहीं की जा सकती।

SECL का 13 मई 2022 का आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने लखनलाल राठौर के रोजगार दावे को खारिज करने वाले एसईसीएल के 13 मई 2022 के आदेश को निरस्त कर दिया।

इसके साथ ही अदालत ने एसईसीएल प्रबंधन को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के रोजगार संबंधी आवेदन पर अधिग्रहण के समय प्रभावी छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति के तहत नए सिरे से विचार करे।

कोर्ट ने इस प्रक्रिया के लिए 45 दिनों की समयसीमा तय की है। यह अवधि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से शुरू होगी।

2 एकड़ से कम जमीन वाले भू-विस्थापितों के लिए क्यों अहम है फैसला?

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विवाद का एक प्रमुख बिंदु दो एकड़ से कम भूमि वाले भू-विस्थापितों की रोजगार पात्रता से जुड़ा था।

2012 की नीति का हवाला देकर याचिकाकर्ता का दावा इसलिए खारिज किया गया था क्योंकि उसकी अधिग्रहित जमीन 0.10 एकड़ थी। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि केवल बाद में लागू हुई नीति के आधार पर पुराने अधिग्रहण से जुड़े रोजगार दावे को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इस फैसले का वास्तविक प्रभाव संबंधित प्रकरण में अधिग्रहण के समय लागू नीति की पात्रता शर्तों और याचिकाकर्ता के तथ्यों की जांच के बाद ही तय होगा। हाईकोर्ट ने एसईसीएल को सीधे नियुक्ति देने के बजाय पुराने नियमों के तहत दावे पर पुनर्विचार कर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

45 दिन में करना होगा नए सिरे से फैसला

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब एसईसीएल को लखनलाल राठौर के आवेदन की नए सिरे से जांच करनी होगी।

इसमें मुख्य रूप से देखा जाएगा कि—

  • वर्ष 2009 में अधिग्रहण के समय कौन-सी पुनर्वास नीति प्रभावी थी;
  • उस नीति के तहत याचिकाकर्ता रोजगार के लिए पात्र है या नहीं;
  • प्रभावित परिवार की पात्रता क्या थी;
  • अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज और अन्य शर्तें क्या थीं।

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद एसईसीएल को 45 दिनों के भीतर उचित निर्णय लेना होगा।

फैसले की बड़ी बात

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि भूमि अधिग्रहण के समय जो पुनर्वास नीति लागू थी, रोजगार के दावे का परीक्षण उसी नीति के आधार पर किया जाना चाहिए। बाद में बदली गई नीति को आधार बनाकर पहले के अधिग्रहण से जुड़े रोजगार दावे को स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता।

यह फैसला छत्तीसगढ़ में खनन परियोजनाओं से प्रभावित भू-विस्थापितों और पुनर्वास संबंधी रोजगार दावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण कानूनी नजीर के रूप में देखा जा सकता है।

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Author: cg24x7

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