हंगामे की भेंट चढ़ा संसद का मानसून सत्र, आखिरी दिनों में सरकार ने तेज की विधायी रफ्तार; FCRA JPC में, परिसीमन पर फिर टिकी नजर

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र गुरुवार, 13 अगस्त को हंगामे और राजनीतिक टकराव के बीच समाप्त हो गया। पूरे सत्र के दौरान विपक्ष के विरोध और लगातार स्थगन के कारण सदन की कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित रही, लेकिन सत्र के अंतिम दिनों में सरकार ने लंबित विधायी एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाया। संसद के दोनों सदनों को अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।

यानी एक तरफ सदन में चर्चा और बहस के लिए समय कम मिलता रहा, तो दूसरी तरफ सरकार ने आखिरी दिनों में कई विधेयकों को पारित कराने की कोशिश तेज कर दी। यही वजह है कि मानसून सत्र को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई—सरकार ने इसे विधायी कामकाज का सत्र बताया, जबकि विपक्ष ने लगातार हंगामे और कम चर्चा के बीच विधेयकों को आगे बढ़ाने पर सवाल उठाए।

FCRA विधेयक पर सरकार को पीछे हटना पड़ा

सत्र की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, 2026 रहा। सरकार इस विधेयक को आगे बढ़ाना चाहती थी, लेकिन विपक्ष और अन्य पक्षों के विरोध के बीच इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया।

इस विधेयक में उन संस्थाओं की विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान से जुड़ा ढांचा प्रस्तावित किया गया है, जिनका FCRA पंजीकरण समाप्त या रद्द हो जाता है। विधेयक में कानून के उल्लंघन पर अधिकतम सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी शामिल है।

JPC को भेजे जाने का मतलब है कि अब विधेयक पर विभिन्न दलों के सांसद विस्तार से विचार करेंगे और अपनी सिफारिशें देंगे। इसके बाद सरकार संशोधनों पर विचार कर सकती है और विधेयक को आगे संसद में ला सकती है।

आखिर परिसीमन विधेयक का क्या हुआ?

परिसीमन को लेकर स्थिति FCRA से बिल्कुल अलग है। परिसीमन विधेयक, 2026 मानसून सत्र में नया विधेयक बनकर आगे नहीं बढ़ा।

दरअसल, परिसीमन से जुड़े तीन विधेयक इससे पहले बजट सत्र में लाए गए थे—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026। इनका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के साथ महिलाओं के लिए सीट आरक्षण की व्यवस्था को आगे बढ़ाना था।

लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत जरूरी विशेष बहुमत नहीं मिल सका। इसे लोकसभा में 298 के मुकाबले 230 वोटों से अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उससे जुड़े केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन और परिसीमन विधेयक भी आगे नहीं बढ़ सके और निष्प्रभावी हो गए।

इसलिए मानसून सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन विधेयक को पारित कराने की स्थिति बनी ही नहीं। हालांकि परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है और आगे सरकार किस रूप में इसे फिर संसद के सामने लाती है, इस पर नजर रहेगी।

सरकार के लिए FCRA क्यों महत्वपूर्ण था?

FCRA संशोधन विधेयक सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि इसके जरिए विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लाइसेंस समाप्त होने, रद्द होने या नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में उनकी संपत्तियों से संबंधित व्यवस्था को अधिक स्पष्ट करने की कोशिश की गई है।

विपक्ष ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां जताई थीं और सरकार से इसे वापस लेने की मांग की थी। अंततः व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के लिए इसे JPC के पास भेजने का रास्ता अपनाया गया।

अब इस विधेयक की आगे की दिशा समिति की रिपोर्ट और सरकार के रुख पर निर्भर करेगी।

हंगामे के बावजूद विधायी कामकाज तेज

मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला और कुल 19 बैठकें निर्धारित थीं। सत्र शुरू होने से पहले संसद में बड़ी संख्या में विधेयक लंबित थे।

सत्र के दौरान विपक्ष के लगातार विरोध के कारण सदन की उत्पादकता काफी प्रभावित हुई। अंतिम दिन तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों सदनों ने कई विधेयक पारित किए, हालांकि सत्र की बड़ी तस्वीर राजनीतिक टकराव और कम कार्यवाही से बनी रही।

आखिरी दिनों में सरकार ने लंबित विधायी कामकाज को तेजी से निपटाने की कोशिश की। इससे विपक्ष ने आरोप लगाया कि जिन विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाई, उन्हें जल्दबाजी में पारित कराया गया। दूसरी ओर सरकार का तर्क रहा कि लगातार व्यवधान के कारण सदन का समय बर्बाद हुआ और उपलब्ध समय में विधायी कामकाज पूरा करना जरूरी था।

अब आगे क्या?

मानसून सत्र खत्म होने के साथ FCRA विधेयक अब सीधे कानून बनने के रास्ते पर नहीं है। इसे JPC की जांच और सिफारिशों से गुजरना होगा। वहीं परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पहले ही बजट सत्र में संवैधानिक बहुमत की परीक्षा में अटक चुके हैं।

इस लिहाज से मानसून सत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही रहा कि हंगामे के बीच सरकार ने कई विधायी मोर्चों पर अपनी गति बनाए रखी, लेकिन FCRA जैसे विवादित मुद्दे पर उसे संसदीय समिति के रास्ते पर जाना पड़ा।

दूसरी ओर, परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़ा एजेंडा फिलहाल ठहर गया है, लेकिन यह मुद्दा समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले सत्रों में सरकार इसे किस नए राजनीतिक और संवैधानिक समीकरण के साथ आगे बढ़ाती है, यह देश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

यानी मानसून सत्र भले ही हंगामे में डूबा रहा, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज अगले संसद सत्र तक सुनाई देती रहेगी—FCRA JPC में पहुंच चुका है और परिसीमन पर अगली चाल का इंतजार है।

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Author: cg24x7

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