केरल हुआ ‘केरलम’: मोदी सरकार ने कराया लोकसभा में प्रदेश का नाम बदलने वाला बिल पास, जानिए आखिर क्यों उठी दशकों पुरानी मांग?

नई दिल्ली। दक्षिण भारत के राज्य केरल के नाम को लेकर एक बड़ा संवैधानिक बदलाव प्रस्तावित है। लोकसभा ने मंगलवार, 11 अगस्त को विपक्ष के विरोध के बीच केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया। हालांकि अभी राज्य का आधिकारिक नाम नहीं बदला है। बिल को कानून बनने के लिए राज्यसभा से पारित होना और इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना जरूरी है।

नाम बदलने की यह मांग महज शब्दों का बदलाव नहीं है। इसके पीछे मलयालम भाषा, राज्य की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक नामकरण से जुड़ा तर्क है। केरल विधानसभा इस संबंध में पहले ही दो बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम बदलने की मांग कर चुकी है।

आखिर ‘केरल’ से ‘केरलम’ क्यों?

केरल विधानसभा का तर्क है कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम पहले से ही ‘केरलम’ है, जबकि अंग्रेजी में और भारतीय संविधान की पहली अनुसूची में इसे ‘केरल’ लिखा गया है।

राज्य सरकार और विधानसभा का मानना है कि आधिकारिक दस्तावेजों और संविधान में भी राज्य का नाम उसकी स्थानीय भाषाई पहचान के अनुरूप ‘केरलम’ होना चाहिए।

इसी मांग को लेकर अगस्त 2023 में केरल विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद जून 2024 में एक बार फिर विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया।

केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में दी मंजूरी

केरल विधानसभा के प्रस्ताव के बाद नाम परिवर्तन की प्रक्रिया केंद्र तक पहुंची। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फरवरी 2026 में केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

इसके बाद प्रस्तावित विधेयक को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राज्य विधानसभा के पास भेजा गया। विधानसभा ने भी इस प्रस्ताव का सर्वसम्मति से समर्थन किया।

इसके बाद 10 अगस्त को लोकसभा में विधेयक पेश किया गया और 11 अगस्त को इसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।

अब इसकी अगली परीक्षा राज्यसभा में होगी।

‘केरलम’ शब्द की जड़ें कितनी पुरानी हैं?

‘केरलम’ नाम को लेकर इतिहास में कई अलग-अलग मत मिलते हैं। इसकी प्राचीनता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण सम्राट अशोक के 257 ईसा पूर्व के शिलालेख II में मिलता है।

इस शिलालेख में अशोक के साम्राज्य और सीमावर्ती दक्षिण भारतीय राज्यों का उल्लेख करते हुए ‘केरलपुत्र’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। संस्कृत में ‘केरलपुत्र’ का अर्थ मोटे तौर पर ‘केरल का पुत्र’ माना जाता है। इतिहासकार इसे दक्षिण भारत के चेर राजवंश से जोड़ते हैं।

यानी ‘केरल’ या इससे मिलते-जुलते नाम की जड़ें आधुनिक राज्य के गठन से सदियों पहले के इतिहास तक जाती हैं।

नाम की उत्पत्ति को लेकर कई सिद्धांत

‘केरलम’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर इतिहास और भाषाविज्ञान में एकमत राय नहीं है। जर्मन मिशनरी और भाषा विशेषज्ञ हरमन गुंडर्ट, जिन्होंने शुरुआती मलयालम-अंग्रेजी शब्दकोश तैयार किया था, ने कन्नड़ के ‘केरम’ और ‘चेरम’ शब्दों के बीच संबंध की ओर संकेत किया था।

इन शब्दों का इस्तेमाल गोकर्ण से लेकर कन्याकुमारी के बीच के तटीय क्षेत्र के संदर्भ में किए जाने की बात कही जाती है।

एक अन्य भाषाई सिद्धांत के अनुसार यह नाम पुराने तमिल मूल ‘चेर’, जिसका अर्थ जोड़ना या मिलना माना जाता है, और ‘अलम’, जिसका अर्थ क्षेत्र या भूमि है, से मिलकर बना हो सकता है।

इस तरह ‘केरलम’ केवल आधुनिक राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के लंबे भाषाई और ऐतिहासिक विकास से जुड़ा हुआ नाम है।

आखिर आधुनिक केरल राज्य बना कैसे?

आज का केरल एक दिन में अस्तित्व में नहीं आया। मलयालम बोलने वाले लोग ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग राजनीतिक क्षेत्रों में रहते थे। इनमें त्रावणकोर और कोचीन की रियासतें तथा मद्रास प्रेसीडेंसी का मालाबार क्षेत्र प्रमुख थे।

मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक राज्य में मिलाने की मांग 1920 के दशक में ‘ऐक्य केरल’ यानी यूनाइटेड केरल आंदोलन के दौरान मजबूत हुई।

आजादी के बाद 1949 में त्रावणकोर और कोचीन की रियासतों को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया। इसके बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग ने जोर पकड़ा।

राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर 1956 को आधुनिक केरल राज्य अस्तित्व में आया।

नए राज्य में मालाबार जिला और कासरगोड तालुक शामिल किए गए। वहीं त्रावणकोर के कुछ दक्षिणी हिस्से बाद में तमिलनाडु का हिस्सा बन गए।

दिलचस्प बात यह है कि मलयालम में नए राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता रहा, लेकिन अंग्रेजी और संविधान में इसका आधिकारिक नाम ‘केरल’ ही रहा।

किसी राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

भारत के संविधान में राज्यों के नाम बदलने की स्पष्ट प्रक्रिया मौजूद है। अनुच्छेद 3 संसद को किसी राज्य के गठन, क्षेत्र, सीमा या नाम में बदलाव करने की शक्ति देता है।

हालांकि ऐसी प्रक्रिया संसद में सीधे शुरू नहीं की जा सकती। इसके लिए राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी होती है।

यदि किसी विधेयक का संबंध किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में बदलाव से है, तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य विधानसभा की राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती। यानी विधानसभा सहमत हो या असहमत, अंतिम निर्णय संसद के पास रहता है।

केरल के मामले में अब तक क्या हुआ?

केरल का नाम ‘केरलम’ करने की प्रक्रिया में अब तक घटनाक्रम इस तरह आगे बढ़ा है—

  • अगस्त 2023: केरल विधानसभा ने नाम बदलने के लिए प्रस्ताव पारित किया।
  • जून 2024: विधानसभा ने दोबारा सर्वसम्मति से केंद्र से ‘केरलम’ नाम अपनाने की मांग की।
  • फरवरी 2026: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रस्ताव को मंजूरी दी।
  • राज्य विधानसभा: प्रस्तावित बदलाव पर सर्वसम्मति से सहमति जताई।
  • 10 अगस्त 2026: नाम परिवर्तन विधेयक लोकसभा में पेश किया गया।
  • 11 अगस्त 2026: लोकसभा ने ध्वनि मत से विधेयक पारित कर दिया।

अब इस प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव राज्यसभा है।

अभी आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ नहीं हुआ है नाम

लोकसभा से विधेयक पारित होने के बावजूद अभी राज्य का संवैधानिक नाम नहीं बदला है। बिल को पहले राज्यसभा से पारित होना होगा। इसके बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

राष्ट्रपति की मंजूरी और कानून के प्रभावी होने के बाद ही संविधान तथा आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड में राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ किया जा सकेगा।

नाम बदलने से क्या बदलेगा?

अगर विधेयक कानून बन जाता है तो सबसे बड़ा बदलाव राज्य की आधिकारिक संवैधानिक और प्रशासनिक पहचान में होगा। केंद्र और राज्य सरकार के दस्तावेजों, संविधान की पहली अनुसूची तथा अन्य आधिकारिक संदर्भों में ‘केरल’ की जगह ‘केरलम’ नाम इस्तेमाल किया जाएगा।

हालांकि इससे राज्य की सीमाओं, प्रशासनिक ढांचे या जिलों में कोई बदलाव नहीं होगा। यह मुख्य रूप से राज्य के आधिकारिक नाम में बदलाव होगा।

सिर्फ नाम नहीं, पहचान से जुड़ा सवाल

‘केरल’ से ‘केरलम’ करने की मांग को समर्थक केवल प्रशासनिक संशोधन के तौर पर नहीं देखते। उनके लिए यह मलयालम भाषा और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक मान्यता देने का विषय है।

दूसरी ओर, विपक्ष की ओर से विधेयक की प्रक्रिया और इसे संसद में लाने के तरीके को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

अब नजर राज्यसभा पर है। यदि वहां भी विधेयक पारित हो जाता है और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है, तो भारतीय संघ के राज्यों की सूची में एक और नाम आधिकारिक रूप से बदल जाएगा।

यानी जिस नाम को मलयालम में लोग सदियों से ‘केरलम’ कहते आए हैं, वह अब संविधान में भी उसी नाम से दर्ज होने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ गया है।

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Author: cg24x7

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