दोरनापाल में हुआ दो तिरंगा यात्राओं का भव्य मिलन, ताड़मेटला-बुरकापाल-जगरगुंडा होते हुए सिलगेर-टेकलगुड़ा पहुंची यात्रा; गृह मंत्री विजय शर्मा बोले—बस्तर में हिंसा पराजित और लोकतंत्र विजयी हुआ
सुकमा। कभी जिन सड़कों पर माओवादी हिंसा का खौफ और काले झंडों का साया दिखाई देता था, उन्हीं रास्तों पर अब तिरंगा शान से लहरा रहा है। दक्षिण बस्तर के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि बदलते दौर और बदलती तस्वीर का प्रतीक बनकर सामने आई। नक्सल हिंसा के लंबे दौर के लिए चर्चित रहे इलाकों में पहली बार निकली भव्य तिरंगा यात्रा ने बस्तर के नए अध्याय की तस्वीर पेश की।
यात्रा की शुरुआत एर्राबोर से हुई। यहां गृह मंत्री विजय शर्मा और सांसद महेश कश्यप बाइक पर सवार होकर हाथों में तिरंगा लेकर रवाना हुए। वहीं वन मंत्री केदार कश्यप ने चिंगावरम से बाइक के जरिए यात्रा की कमान संभाली। दोनों दिशाओं से निकली तिरंगा यात्राएं दोरनापाल में एकजुट हुईं। इसके बाद सैकड़ों लोगों और वाहनों के साथ यात्रा ताड़मेटला, बुरकापाल और जगरगुंडा होते हुए सिलगेर-टेकलगुड़ा पहुंची, जहां इसका समापन हुआ।
एर्राबोर से निकला तिरंगा, बदली पहचान
एर्राबोर का नाम दक्षिण बस्तर के उस दर्दनाक इतिहास से जुड़ा रहा है, जिसने वर्षों तक इस क्षेत्र के सामाजिक जीवन और विकास को प्रभावित किया। 16-17 जुलाई 2006 की हिंसक घटनाओं ने इस इलाके को गहरे जख्म दिए थे। उस दौर में ग्रामीणों के लिए सामान्य जीवन जीना भी चुनौती बन गया था।
राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराना भी कई इलाकों में जोखिम से भरा माना जाता था। ऐसे में उसी एर्राबोर की धरती से बाइक पर सवार होकर हाथों में तिरंगा लेकर निकली यात्रा ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया।
सड़कों पर राष्ट्रध्वज लहराते लोग, बाइक पर सवार युवा और देशभक्ति के नारों से गूंजता वातावरण यह संदेश दे रहा था कि बस्तर अब हिंसा की पहचान से आगे बढ़कर विकास, लोकतंत्र और राष्ट्रभक्ति की नई पहचान बना रहा है।
दो दिशाओं से निकली यात्राएं, दोरनापाल में हुआ संगम
एर्राबोर में आयोजित कार्यक्रम के बाद गृह मंत्री विजय शर्मा और सांसद महेश कश्यप तिरंगा लेकर बाइक से रवाना हुए। दूसरी ओर वन मंत्री केदार कश्यप ने चिंगावरम से यात्रा शुरू की।
दोनों यात्राओं के दोरनापाल पहुंचने पर माहौल देखते ही बनता था। यहां बच्चों ने करीब 100 मीटर लंबा तिरंगा लेकर यात्रियों का स्वागत किया। सड़क के दोनों ओर खड़े बच्चों और ग्रामीणों के हाथों में छोटे-छोटे राष्ट्रध्वज थे।
तिरंगे के रंगों से सजा यह दृश्य दक्षिण बस्तर में हो रहे बदलाव की जीवंत तस्वीर बन गया। जिस क्षेत्र में कभी भय और बंदूक की चर्चा होती थी, वहां अब बच्चे राष्ट्रध्वज के साथ स्वागत करते नजर आए।
ताड़मेटला से बुरकापाल और जगरगुंडा तक पहुंचा संदेश
दोरनापाल में दोनों यात्राओं के एकजुट होने के बाद तिरंगा यात्रा आगे बढ़ी। यात्रा ने ताड़मेटला, बुरकापाल और जगरगुंडा जैसे उन इलाकों का रुख किया, जिनका नाम भी लंबे समय तक माओवादी हिंसा के संदर्भ में लिया जाता रहा।
इन इलाकों से होकर तिरंगे का गुजरना अपने आप में एक बड़ा संदेश रहा। यात्रा का अंतिम पड़ाव सिलगेर-टेकलगुड़ा रहा, जहां पहुंचकर कार्यक्रम का समापन हुआ।
यात्रा के दौरान लोगों में खासा उत्साह दिखाई दिया। बाइक रैली, राष्ट्रध्वज और देशभक्ति के नारों ने पूरे मार्ग को एक अलग माहौल में बदल दिया।
शर्मा बोले—आज की तिरंगा यात्रा बड़े बदलाव की तस्वीर
गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस अवसर पर बस्तर के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि बस्तर में लोकतंत्र की जीत हुई है और हिंसा पराजित हुई है।
उन्होंने कहा कि अब बस्तर की पहचान हर घर, पंचायत और संस्थान पर गर्व से लहराते तिरंगे से होनी चाहिए। उनके मुताबिक राष्ट्रध्वज केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि बस्तर के स्वाभिमान, लोकतांत्रिक अधिकार और नए भविष्य का प्रतीक है।
बंदूक के साए से लोकतंत्र की राह तक
दक्षिण बस्तर में तिरंगा यात्रा का महत्व केवल राजनीतिक या औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह उन इलाकों में सामान्य होते जनजीवन की तस्वीर भी सामने लाती है, जहां कभी हिंसा के कारण आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसी गतिविधियां प्रभावित होती रही हैं।
एर्राबोर से सिलगेर-टेकलगुड़ा तक तिरंगा यात्रा का पहुंचना इस बदलाव की प्रतीकात्मक तस्वीर बना। कभी जहां बंदूक और हिंसा का भय चर्चा में रहता था, वहीं अब तिरंगे और लोकतंत्र की बात हो रही है।
बस्तर के लिए नया संदेश
इस तिरंगा यात्रा ने दक्षिण बस्तर के लोगों के बीच एक नया संदेश देने की कोशिश की—बस्तर का भविष्य हिंसा में नहीं, बल्कि शांति, लोकतंत्र और विकास में है।
दोरनापाल में बच्चों द्वारा 100 मीटर लंबे तिरंगे के साथ यात्रा का स्वागत इस पूरे आयोजन का सबसे भावुक दृश्य रहा। यह दृश्य मानो उस बदलाव की कहानी कह रहा था, जिसमें पिछली पीढ़ियों के भय के स्थान पर नई पीढ़ी के हाथों में राष्ट्रध्वज दिखाई दे रहा है।
एर्राबोर से शुरू होकर सिलगेर-टेकलगुड़ा तक पहुंची यह यात्रा इसलिए भी यादगार रही क्योंकि उसने दक्षिण बस्तर के उन रास्तों पर तिरंगे की मौजूदगी दर्ज कराई, जिन्हें कभी माओवादी प्रभाव के मजबूत गढ़ के रूप में देखा जाता था।
बस्तर की इस बदली तस्वीर में तिरंगा सिर्फ लहराता हुआ नजर नहीं आया, बल्कि यह संदेश देता दिखा कि हिंसा के लंबे साये के बाद अब लोकतंत्र और विकास की रोशनी इन इलाकों तक पहुंच रही है।
Author: cg24x7




