छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के दो अहम फैसले: वन विकास निगम में पदोन्नति नियम बदलने का आदेश रद्द, साइबर अपराध मामलों के लिए 4 सप्ताह में विशेषज्ञ नियुक्त करने के निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुधवार को दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए एक ओर छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम में पदोन्नति के नियम बदलने के राज्य सरकार और निगम के फैसले को निरस्त कर दिया, वहीं दूसरी ओर प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक (Electronic Evidence Examiner) की नियुक्ति चार सप्ताह के भीतर पूरी करने के निर्देश केंद्र और राज्य सरकार को दिए हैं।

अदालत ने अपने दोनों आदेशों में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णय कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही होने चाहिए तथा न्याय व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक विशेषज्ञों की नियुक्ति में अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं है।


वन विकास निगम में पदोन्नति का मापदंड बदलना अवैध

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम में डिप्टी मैनेजर (फॉरेस्ट्री) जूनियर के पद पर पदोन्नति के लिए अपनाए गए नए मापदंड को अवैध घोषित करते हुए राज्य सरकार और निगम के निर्णय को निरस्त कर दिया।

मामले में निगम ने पदोन्नति के लिए लागू ‘सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी’ (वरिष्ठता एवं उपयुक्तता) के स्थान पर ‘मेरिट-कम-सीनियरिटी’ (योग्यता एवं वरिष्ठता) का सिद्धांत लागू करने का निर्णय लिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सेवा विनियमों में किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया गया है, तो केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर पदोन्नति की प्रक्रिया या उसके मानदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता।


प्रशासनिक आदेश से नहीं बदले जा सकते सेवा नियम

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सेवा विनियम, 1984 में निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य है। जब तक नियमों में विधिवत संशोधन नहीं किया जाता, तब तक किसी प्रशासनिक स्वीकृति या प्रस्ताव के आधार पर पदोन्नति का आधार नहीं बदला जा सकता।

कोर्ट ने इसी आधार पर राज्य सरकार द्वारा दी गई प्रशासनिक स्वीकृति और वन विकास निगम के प्रस्ताव दोनों को निरस्त कर दिया।


इन अधिकारियों ने दी थी हाईकोर्ट में चुनौती

यह याचिका विनीत कुमार सिंह सहित आठ प्रोजेक्ट रेंज अधिकारियों ने दायर की थी। याचिकाकर्ताओं में विवेक देवांगन, महेश खटकर, शिल्पी नरेड़िया, जागेश कुमार गोंड, जयपाल सिंह पवार, सरिता सिदार और अभिनंदन गोस्वामी शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि—

  • उनकी नियुक्ति वर्ष 2017 में प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से प्रोजेक्ट रेंज अधिकारी के रूप में हुई थी।
  • वे वर्ष 2022 से पदोन्नति के लिए पात्र हैं।
  • सेवा विनियम, 1984 के विनियम 21(2)(स) के अनुसार पदोन्नति का आधार सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी निर्धारित है।
  • इसके बावजूद निगम ने 16 अप्रैल 2026 को प्रस्ताव पारित कर तथा राज्य सरकार ने 12 जून 2026 को प्रशासनिक स्वीकृति देकर मेरिट-कम-सीनियरिटी लागू करने की अनुमति दे दी।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार करते हुए संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया।


साइबर अपराध मामलों में हाईकोर्ट की सख्ती

एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक (Electronic Evidence Examiner) की नियुक्ति नहीं होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र एवं राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर अगली सुनवाई से पहले अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।


प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विशेषज्ञ का अभाव

यह जनहित याचिका शिरीन मालेवर द्वारा अधिवक्ता रुद्र प्रताप दुबे और गौतम खेत्रपाल के माध्यम से दायर की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि—

  • देश के विभिन्न राज्यों में केंद्र सरकार द्वारा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है।
  • वर्तमान में छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई अधिकृत विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है।
  • साइबर अपराधों की जांच में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की वैज्ञानिक जांच के लिए विशेषज्ञ की अनुपस्थिति गंभीर समस्या बनी हुई है।

बढ़ते साइबर अपराधों के बीच विशेषज्ञ की जरूरत

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के परीक्षण की व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदेश में लगातार साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल साक्ष्यों की प्रमाणिकता और वैज्ञानिक परीक्षण के लिए विशेषज्ञ की नियुक्ति अत्यंत आवश्यक है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया में और विलंब नहीं किया जा सकता।


न्यायिक प्रक्रिया को मिलेगा मजबूती

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक की नियुक्ति होने से साइबर अपराधों की जांच अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी होगी। इससे डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और अदालतों में साइबर अपराध से जुड़े मामलों के निस्तारण में भी तेजी आने की संभावना है।

वहीं वन विकास निगम से जुड़े फैसले को सेवा नियमों की पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया के पालन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट के इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि सेवा शर्तों और पदोन्नति संबंधी नियमों में बदलाव केवल विधिक प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है, मात्र प्रशासनिक आदेश के आधार पर नहीं

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Author: cg24x7

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