ग्लासगो में भारतीय भारोत्तोलकों का शानदार प्रदर्शन, ज्ञानेश्वरी यादव ने महिलाओं के 53 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतकर रचा नया इतिहास, बिंद्यारानी देवी को कांस्य और मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार जीता स्वर्ण
नई दिल्ली/ग्लासगो। राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2026 में भारतीय भारोत्तोलन दल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश की झोली में कई पदक डाले हैं। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की अंतरराष्ट्रीय भारोत्तोलक ज्ञानेश्वरी यादव ने महिलाओं के 53 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश का गौरव बढ़ाया है।
एशियाई चैंपियनशिप की पदक विजेता ज्ञानेश्वरी ने प्रतियोगिता में स्नैच और क्लीन एंड जर्क दोनों वर्गों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कुल 199 किलोग्राम भार उठाया। हालांकि स्वर्ण पदक से वह कुछ अंतर से चूक गईं, लेकिन उनके प्रदर्शन ने भारतीय खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।
199 किलोग्राम कुल भार उठाकर जीता रजत
महिलाओं की 53 किलोग्राम स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी यादव ने स्नैच में 88 किलोग्राम तथा क्लीन एंड जर्क में 111 किलोग्राम वजन उठाया। दोनों प्रयासों को मिलाकर उन्होंने 199 किलोग्राम का कुल भार उठाया, जिसके आधार पर उन्हें रजत पदक मिला।
इस स्पर्धा में नाइजीरिया की ओनोम ओमोलोला दिदिह ने कुल 206 किलोग्राम भार उठाकर नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाया और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। ज्ञानेश्वरी पूरे मुकाबले के दौरान मजबूत चुनौती देती रहीं और शानदार तकनीक एवं संतुलन का प्रदर्शन किया।
छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण
ज्ञानेश्वरी यादव की सफलता छत्तीसगढ़ के खेल इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हो गई है। राजनांदगांव की रहने वाली ज्ञानेश्वरी सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची हैं। उनके संघर्ष, अनुशासन और निरंतर मेहनत ने उन्हें आज भारत की प्रमुख महिला वेटलिफ्टरों में शामिल कर दिया है।
वर्तमान में वह छत्तीसगढ़ पुलिस में सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) के पद पर कार्यरत हैं। खेल और सेवा—दोनों क्षेत्रों में उनका समर्पण युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता है।
बिंद्यारानी देवी ने भी दिलाया कांस्य पदक
भारतीय दल के लिए एक और अच्छी खबर महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग से आई, जहां बिंद्यारानी देवी ने कांस्य पदक जीता। उन्होंने स्नैच में 87 किलोग्राम तथा क्लीन एंड जर्क में 112 किलोग्राम वजन उठाकर कुल 199 किलोग्राम का भार हासिल किया।
इस वर्ग में नाइजीरिया की रफियातु फोलाशादे ने 229 किलोग्राम के रिकॉर्ड कुल भार के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि कनाडा की ऐन सोफी ताशेरो ने 215 किलोग्राम के साथ रजत पदक हासिल किया।
मीराबाई चानू ने फिर रचा इतिहास
भारतीय भारोत्तोलन की स्टार खिलाड़ी मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को प्रतियोगिता का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। उन्होंने कुल 190 किलोग्राम भार उठाकर खेलों का नया रिकॉर्ड बनाया।
इस जीत के साथ मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने का ऐतिहासिक कारनामा किया। इससे पहले भी उन्होंने 2018 और 2022 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीते थे।
भारत की पदक तालिका हुई मजबूत
भारतीय भारोत्तोलकों के शानदार प्रदर्शन से राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की पदक संख्या लगातार बढ़ रही है। मीराबाई चानू के स्वर्ण, ज्ञानेश्वरी यादव के रजत और बिंद्यारानी देवी के कांस्य सहित भारत के खाते में अब कुल छह पदक आ चुके हैं।
इनमें—
- 1 स्वर्ण पदक
- 3 रजत पदक
- 2 कांस्य पदक
शामिल हैं। भारतीय भारोत्तोलन टीम के लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन से आगामी प्रतियोगिताओं में भी देश को और पदकों की उम्मीद बढ़ गई है।
ज्ञानेश्वरी की उपलब्धि बनी नई प्रेरणा
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि ज्ञानेश्वरी यादव का यह प्रदर्शन केवल एक पदक जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर रजत पदक जीतना इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा को उचित अवसर और निरंतर मेहनत मिले तो वह विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकती है।
ज्ञानेश्वरी की सफलता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत की नई पीढ़ी की महिला खिलाड़ी वैश्विक मंच पर किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। अब खेल प्रेमियों को उम्मीद है कि आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वह भारत के लिए स्वर्ण पदक भी जीतेंगी और देश का तिरंगा विश्व मंच पर और ऊंचा करेंगी।
राजनांदगांव/ग्लास्गो। सीमित संसाधन, आर्थिक तंगी, एक साइकिल पर तय होने वाला रोज का सफर और पिता की अथक मेहनत… इन संघर्षों को पीछे छोड़कर छत्तीसगढ़ की अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव ने देश के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में स्वर्ण पदक दिलाया है। स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों की 53 किलोग्राम महिला वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी भारत की सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल थीं।
राजनांदगांव की यह खिलाड़ी पिछले कुछ वर्षों से लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। जूनियर से लेकर सीनियर स्तर तक कई स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीतकर उन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है। अब कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका प्रदर्शन करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का केंद्र बना हुआ है।
छोटे शहर की बेटी ने बड़े सपने देखने का साहस किया
ज्ञानेश्वरी यादव की खेल यात्रा किसी अत्याधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से नहीं, बल्कि राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। उनके पिता दीपक यादव स्वयं बॉडी बिल्डिंग से जुड़े रहे हैं। जब ज्ञानेश्वरी सातवीं कक्षा में थीं, तब वे पिता के साथ व्यायामशाला जाने लगीं।
यहीं उनकी प्रतिभा को पहचान मिली। दीपक यादव ने कोच अजय लोहार से बेटी को वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण देने का अनुरोध किया। पहली बार बारबेल उठाने वाली ज्ञानेश्वरी ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार अभ्यास और अनुशासन ने उन्हें राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।
इलेक्ट्रिशियन पिता की मेहनत बनी बेटी की सबसे बड़ी ताकत
ज्ञानेश्वरी की सफलता के पीछे उनके परिवार का संघर्ष किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। पिता दीपक यादव इलेक्ट्रिशियन का काम करते थे और सीमित आय में पूरे परिवार का खर्च चलाते थे। उसी आय से बेटी की विशेष डाइट, प्रशिक्षण, खेल उपकरण, जूते और प्रतियोगिताओं में भागीदारी का खर्च भी उठाया जाता था।
परिवार ने अपनी कई जरूरतों से समझौता किया, लेकिन ज्ञानेश्वरी के सपनों को कभी अधूरा नहीं रहने दिया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की तैयारी लगातार जारी रही।
एक साइकिल पर तय होता था रोज का संघर्ष
ज्ञानेश्वरी के शुरुआती दिनों का संघर्ष आज भी लोगों को प्रेरित करता है। परिवार ग्राम भोड़िया से प्रतिदिन लगभग आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर राजनांदगांव पहुंचता था। बच्चे पहले स्कूल जाते और फिर कई घंटे व्यायामशाला में अभ्यास करते। देर रात पूरा परिवार उसी साइकिल से घर लौटता था।
घर पर उनकी मां दुर्गा यादव सीमित संसाधनों में पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाती रहीं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने बेटी के खेल करियर में कभी
Author: cg24x7





