गरीबी से ग्लास्गो तक: छत्तीसगढ़ की बेटी ज्ञानेश्वरी यादव इतिहास रचने की दहलीज पर, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को एक और गोल्ड की उम्मीद

राजनांदगांव/ग्लास्गो। सीमित संसाधन, आर्थिक तंगी, एक साइकिल पर तय होने वाला रोज का सफर और पिता की अथक मेहनत… इन संघर्षों को पीछे छोड़कर छत्तीसगढ़ की अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव आज उस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं, जहां पूरा देश उनसे कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में स्वर्ण पदक की उम्मीद लगाए बैठा है। स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों की 53 किलोग्राम महिला वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी भारत की सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल हैं।

राजनांदगांव की यह खिलाड़ी पिछले कुछ वर्षों से लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। जूनियर से लेकर सीनियर स्तर तक कई स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीतकर उन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है। अब कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका प्रदर्शन करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का केंद्र बना हुआ है।

छोटे शहर की बेटी ने बड़े सपने देखने का साहस किया

ज्ञानेश्वरी यादव की खेल यात्रा किसी अत्याधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से नहीं, बल्कि राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। उनके पिता दीपक यादव स्वयं बॉडी बिल्डिंग से जुड़े रहे हैं। जब ज्ञानेश्वरी सातवीं कक्षा में थीं, तब वे पिता के साथ व्यायामशाला जाने लगीं।

यहीं उनकी प्रतिभा को पहचान मिली। दीपक यादव ने कोच अजय लोहार से बेटी को वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण देने का अनुरोध किया। पहली बार बारबेल उठाने वाली ज्ञानेश्वरी ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार अभ्यास और अनुशासन ने उन्हें राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।

इलेक्ट्रिशियन पिता की मेहनत बनी बेटी की सबसे बड़ी ताकत

ज्ञानेश्वरी की सफलता के पीछे उनके परिवार का संघर्ष किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। पिता दीपक यादव इलेक्ट्रिशियन का काम करते थे और सीमित आय में पूरे परिवार का खर्च चलाते थे। उसी आय से बेटी की विशेष डाइट, प्रशिक्षण, खेल उपकरण, जूते और प्रतियोगिताओं में भागीदारी का खर्च भी उठाया जाता था।

परिवार ने अपनी कई जरूरतों से समझौता किया, लेकिन ज्ञानेश्वरी के सपनों को कभी अधूरा नहीं रहने दिया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की तैयारी लगातार जारी रही।

एक साइकिल पर तय होता था रोज का संघर्ष

ज्ञानेश्वरी के शुरुआती दिनों का संघर्ष आज भी लोगों को प्रेरित करता है। परिवार ग्राम भोड़िया से प्रतिदिन लगभग आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर राजनांदगांव पहुंचता था। बच्चे पहले स्कूल जाते और फिर कई घंटे व्यायामशाला में अभ्यास करते। देर रात पूरा परिवार उसी साइकिल से घर लौटता था।

घर पर उनकी मां दुर्गा यादव सीमित संसाधनों में पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाती रहीं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने बेटी के खेल करियर में कभी

cg24x7
Author: cg24x7

Spread the love

यह भी पढ़ें

टॉप स्टोरीज