बंदूक छोड़ थामा स्वदेशी का दामन, आत्मसमर्पित महिलाओं ने रैंप पर पेश की बदलते बस्तर की तस्वीर; मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आत्मीय संवाद कर उज्ज्वल भविष्य का दिया आशीर्वाद
सुकमा, 9 अगस्त 2026। कभी हाथों में बंदूक और आंखों में हिंसा के साये थे, आज वही हाथ स्वदेशी हथकरघा वस्त्रों की खूबसूरती को संवार रहे हैं और वही चेहरे आत्मविश्वास से मुस्कुरा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में शांति और पुनर्वास की बदलती तस्वीर का ऐसा ही भावुक और प्रेरक दृश्य राजधानी रायपुर में देखने को मिला, जब सुकमा जिले की 9 आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक कर अपनी नई जिंदगी का संदेश दिया।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम, रायपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन में इन महिलाओं की प्रस्तुति ने पूरे आयोजन को एक अलग भावनात्मक पहचान दे दी। कभी जिन रास्तों पर हिंसा और भय का साया था, उन्हीं जीवनों में अब कौशल, आत्मनिर्भरता, सम्मान और स्वदेशी संस्कृति के रंग दिखाई दे रहे थे।
कोसा सिल्क में सजा आत्मविश्वास, बदली पहचान
रैंप पर जब सुकमा की आत्मसमर्पित महिलाएं छत्तीसगढ़ के पारंपरिक कोसा सिल्क और हथकरघा परिधानों में उतरीं तो यह महज एक फैशन प्रस्तुति नहीं थी। यह उनके जीवन में आए बदलाव की कहानी थी।
उनके कदमों में झिझक की जगह आत्मविश्वास था और चेहरों पर अपने भविष्य को लेकर उम्मीद दिखाई दे रही थी। दर्शकों के सामने उन्होंने जिस सहजता और गरिमा के साथ रैंप वॉक किया, उसने यह संदेश दिया कि अवसर और सम्मान का रास्ता मिलने पर हिंसा के रास्ते से लौटे लोगों के जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।
इन महिलाओं की यह प्रस्तुति बदलते बस्तर की उस तस्वीर को सामने लेकर आई, जिसमें बंदूक और बारूद की जगह अब हथकरघा, हुनर, स्वदेशी उत्पाद और आत्मनिर्भरता जगह बना रहे हैं।
मुख्यमंत्री साय ने बढ़ाया हौसला
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इन महिलाओं से आत्मीय संवाद किया और उनके साहस की सराहना की। मुख्यमंत्री ने मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले को नई जिंदगी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिया।
पहली बार राजधानी रायपुर पहुंची इन महिलाओं के लिए यह अनुभव बेहद खास रहा। सुकमा के दूरस्थ इलाकों से निकलकर राजधानी के बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना उनके लिए न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि थी, बल्कि पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा गया।
मुख्यमंत्री का आत्मीय व्यवहार और प्रोत्साहन इन महिलाओं के मनोबल को बढ़ाने वाला रहा। कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी ने यह संदेश भी दिया कि राज्य सरकार आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को केवल हिंसा का रास्ता छोड़ने तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है।
सात दिन की ट्रेनिंग ने बदली झिझक
रैंप पर आत्मविश्वास के साथ चलती इन महिलाओं के पीछे सात दिनों की विशेष तैयारी भी रही। जिला प्रशासन और राज्य सरकार की पहल पर मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों ने लगातार 7 दिनों तक उन्हें प्रशिक्षण दिया।
इस दौरान महिलाओं को रैंप वॉक के साथ-साथ वेशभूषा, ग्रूमिंग और सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने का प्रशिक्षण दिया गया। माइक पर बेझिझक बोलने और लोगों के सामने आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत होने की कला भी सिखाई गई।
शुरुआत में जो महिलाएं मंच और कैमरे के सामने आने में संकोच कर रही थीं, प्रशिक्षण के बाद उनमें आत्मविश्वास का नया संचार हुआ। यही आत्मविश्वास राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मंच पर उनके कदमों और मुस्कान में साफ दिखाई दिया।
आत्मसमर्पण से आत्मनिर्भरता तक का सफर
इन महिलाओं की कहानी को केवल एक रैंप वॉक या फैशन शो के रूप में देखना इस पूरी पहल के उद्देश्य को सीमित कर देना होगा। यह आत्मसमर्पण से आत्मनिर्भरता तक की यात्रा का प्रतीक है।
हिंसा के रास्ते से लौटकर मुख्यधारा में आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती ऐसे लोगों के लिए सम्मानजनक जीवन का रास्ता तैयार करना होती है। पुनर्वास की सफलता तभी मानी जाती है जब आत्मसमर्पण करने वाला व्यक्ति समाज में अपनी नई पहचान बना सके और अपने परिवार तथा समुदाय के लिए सुरक्षित एवं सम्मानजनक जीवन जी सके।
इसी दिशा में कौशल विकास और रोजगारपरक गतिविधियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सुकमा की इन महिलाओं को हथकरघा और स्वदेशी परिधानों से जोड़ना इसी सोच का हिस्सा है।
हथकरघा बना नई पहचान का माध्यम
छत्तीसगढ़ की समृद्ध हथकरघा परंपरा और कोसा सिल्क केवल कपड़ा नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। आत्मसमर्पित महिलाओं को इसी विरासत से जोड़ना पुनर्वास के साथ-साथ स्थानीय कला और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
रैंप पर इन महिलाओं ने जब पारंपरिक परिधानों को प्रदर्शित किया तो यह दृश्य दो संदेश एक साथ लेकर आया—पहला, बस्तर में बदलाव संभव है, और दूसरा, स्थानीय हुनर और परंपरा लोगों के जीवन को नई आर्थिक दिशा दे सकती है।
लाल आतंक से विकास की राह तक
बस्तर लंबे समय तक नक्सल हिंसा की चुनौती से प्रभावित रहा है। ऐसे में किसी व्यक्ति का हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना केवल व्यक्तिगत बदलाव नहीं होता, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति की संभावनाओं को मजबूत करता है।
सुकमा की इन नौ महिलाओं का रैंप वॉक इसी बदलाव का प्रतीक बनकर सामने आया। जिन कदमों ने कभी जंगलों में हिंसा और भय का रास्ता देखा था, उन्हीं कदमों ने राजधानी के मंच पर हथकरघा और कोसा सिल्क की खूबसूरती को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
यह दृश्य इस बात का भी प्रतीक रहा कि बंदूक छोड़ने के बाद जिंदगी खत्म नहीं होती, बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत हो सकती है।
पुनर्वास नीति की मानवीय तस्वीर
छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति का उद्देश्य आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को हिंसा के रास्ते से निकालकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। कौशल विकास, रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर इस प्रक्रिया को मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
सुकमा की आत्मसमर्पित महिलाओं की यह प्रस्तुति पुनर्वास नीति के इसी मानवीय पक्ष को सामने लाती है। यह बताती है कि पुनर्वास केवल सरकारी सहायता या आर्थिक पैकेज तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के आत्मसम्मान, पहचान और आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बदलते बस्तर की नई तस्वीर
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर रायपुर के मंच से सामने आई यह कहानी बस्तर के लिए एक उम्मीद भरा संदेश है। यह तस्वीर बताती है कि यदि हिंसा से लौटे लोगों को अवसर, प्रशिक्षण और समाज का विश्वास मिले तो वे अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
सुकमा की इन नौ महिलाओं ने रैंप पर चलकर सिर्फ हथकरघा परिधान नहीं दिखाए, बल्कि अपने जीवन के बदलाव की कहानी भी प्रस्तुत की। उनकी मुस्कान में आत्मसम्मान था, कदमों में विश्वास था और भविष्य के प्रति उम्मीद थी।
यह सिर्फ एक फैशन शो नहीं था। यह हिंसा से विकास, भय से विश्वास और भटके हुए जीवन से सम्मानजनक भविष्य की ओर बढ़ते नए छत्तीसगढ़ की सशक्त तस्वीर थी।
Author: cg24x7




