रायपुर। गेवरा-बिलासपुर मेमू रेल दुर्घटना से सीख लेने के बाद अब रेलवे प्रशासन ने लोको पायलटों और असिस्टेंट लोको पायलटों के लिए नए सिरे से कड़ा प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। लोको पायलटों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रस्थान स्टेशन पर ही ट्रेन तैयार करते लीकेज की सघन जांच करें। यदि प्रेशर निर्धारित मात्रा में नहीं बन रहा है, तो लोको और पहले वैगन के बीच के सभी कॉक बंद करें।
लोको का लीकेज टेस्ट और कंप्रेसर कैपेबिलिटी टेस्ट अनिवार्य रूप से करें। 86 बिंदुओं वाले चेकलिस्ट के आधार पर ही इंजन का संचालन करें। बता दें कि दुर्घटना से सबक लेते हुए रेलवे ने नवंबर में पहली बार एक विशेष ‘चालक पत्र’ जारी किया है। ट्रेनिंग के दौरान यह पत्र सभी चालकों को अनिवार्य रूप से दिया जा रहा है। इसमें सुरक्षित ट्रेन परिचालन के लिए 86 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। ये दिशा-निर्देश अलग-अलग इंजन की कार्यप्रणाली के आधार पर तैयार किए गए हैं।
उच्चाधिकारियों को हटाए जाने के बाद माहौल गर्म
दिवंगत लोको पायलट विद्यासागर को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। जांच में पायलट के साइको टेस्ट में फेल होने के खुलासे से रेल अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। नवंबर की इस दुर्घटना के बाद बिलासपुर रेल मंडल में हड़कंप मचा हुआ है। रेलवे बोर्ड द्वारा डीआरएम सहित चार उच्चाधिकारियों को हटाए जाने के बाद से विभाग में दहशत का माहौल है। जांच में यह गंभीर बात सामने आई है कि साइको टेस्ट में फेल होने के बावजूद अधिकारियों ने कथित तौर पर दबाव डालकर विद्यासागर से मेमू ट्रेन चलवाई, जिससे 14 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। अब इस मामले में जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने की कवायद तेज कर दी गई है।
परिचालन में तकनीकी खामियों पर विशेष ध्यान जरूरी
रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रेन संचालन के दौरान तकनीकी खामियों, खासकर ब्रेक पाइप और फीड पाइप में लीकेज, यदि निर्धारित सीमा से अधिक हो जाए तो यह गंभीर परिचालन संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकती है। सबसे आम समस्या ब्रेक बाइंडिंग की होती है. जिसमें ब्रेक पूरी तरह से नहीं छूटते और पहियों पर लगातार दबाव बना रहता है। इससे न केवल ट्रेन की रफ्तार धीमी होती है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडराता है। इसके अलावा ट्रेन पार्टिंग यानी चलती ट्रेन के डिब्बों का आपस में अलग हो जाना, लेट रिलीजिंग (ब्रेक खुलने में देरी) और व्हील रिकडिंग (पहियों का पटरी पर फिसलना), स्टालिंग (चढ़ाई या ढलान पर ट्रेन का रुक जाना) जैसी घटनाएं भी इसी कारण उत्पन्न होती हैं। इन समस्याओं का समय पर पता लगाकर निराकरण करना बेहद आवश्यक है, ताकि न केवल ट्रेन की समयबद्धता बनी रहे, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
Author: cg24x7



