दीपक अग्निमित्र | विशेष वेब फीचर | 30 सितंबर
एक भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। उसमें किसी समाज की स्मृतियां, लोककथाएं, कहावतें, गीत, हास्य, संवेदनाएं और जीवन को देखने का अपना नजरिया सुरक्षित रहता है। इसलिए किसी भाषा का विकास केवल उसके बोलने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि वह शिक्षा, साहित्य, प्रशासन, तकनीक, मीडिया और ज्ञान-विज्ञान के नए क्षेत्रों में कितनी मजबूती से प्रवेश कर रही है। छत्तीसगढ़ के लिए यह सवाल छत्तीसगढ़ी भाषा के संदर्भ में खास महत्व रखता है। गांव की चौपाल से लेकर लोकमंच तक, पारंपरिक गीतों से लेकर आधुनिक साहित्य तक और रोजमर्रा के संवाद से लेकर डिजिटल माध्यमों तक छत्तीसगढ़ी ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। और जब दुनिया 30 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाती है, तब छत्तीसगढ़ी के सामने एक बड़ा अवसर भी दिखाई देता है—अपनी स्थानीय संवेदना को दूसरी भाषाओं तक पहुंचाने और दूसरी भाषाओं के ज्ञान को छत्तीसगढ़ी में लाने का।
अनुवाद दिवस का संदेश: भाषा जोड़ती है, दूरी नहीं बढ़ाती
संयुक्त राष्ट्र ने 30 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के रूप में घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 मई 2017 को प्रस्ताव 71/288 के माध्यम से भाषा पेशेवरों की भूमिका को रेखांकित करते हुए इस दिवस की घोषणा की थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अनुवाद, दुभाषिया सेवा और पारिभाषिक कार्य संवाद, समझ, सहयोग और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनुवाद का अर्थ केवल अंग्रेजी को हिंदी या हिंदी को किसी दूसरी भाषा में बदलना नहीं है। यह अलग-अलग समाजों के अनुभवों के बीच सेतु बनाने की प्रक्रिया है। यही दृष्टि छत्तीसगढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि छत्तीसगढ़ी की श्रेष्ठ कहानियां, लोककथाएं, कविताएं और साहित्य हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में पहुंचते हैं, तो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक दुनिया का विस्तार होगा। दूसरी ओर विज्ञान, तकनीक, कृषि, स्वास्थ्य, कानून और शिक्षा से जुड़ी उपयोगी सामग्री का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद स्थानीय स्तर पर ज्ञान तक पहुंच आसान बना सकता है।
छत्तीसगढ़ी: लोकजीवन से साहित्य तक की समृद्ध परंपरा
छत्तीसगढ़ी की सबसे बड़ी ताकत उसका लोकजीवन से गहरा संबंध है। लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, पहेलियां, नाचा, पंडवानी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक सांस्कृतिक रूपों ने भाषा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है। छत्तीसगढ़ी साहित्य में लोकजीवन के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक सरोकार भी दिखाई देते हैं। राज्य की स्कूली पाठ्य सामग्री में भी छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को स्थान दिया गया है और इसके लोक तथा आधुनिक साहित्य में छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोकजीवन की झलक को रेखांकित किया गया है। यानी छत्तीसगढ़ी केवल बातचीत की भाषा नहीं, बल्कि अनुभव और अभिव्यक्ति की भाषा भी है।
राजभाषा का दर्जा: पहचान से संस्थागत विकास तक
छत्तीसगढ़ी के विकास की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव उसका राजभाषा के रूप में संस्थागत स्थान प्राप्त करना रहा है। छत्तीसगढ़ विधानसभा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ी राजभाषा (संशोधन) विधेयक 2007 को विधानसभा ने 28 नवंबर 2007 को सर्वसम्मति से पारित किया और यह अधिनियम 11 जुलाई 2008 को प्रवृत्त हुआ। इसके साथ भाषा के सामने एक नई जिम्मेदारी भी आई—राजभाषा की पहचान को व्यवहार और संस्थागत कामकाज में लगातार मजबूत करना। भाषा को केवल सांस्कृतिक गौरव का विषय बनाने के बजाय उसके लिए मानकीकृत शब्दावली, प्रशासनिक शब्दकोश, पाठ्य सामग्री, अनुवाद संसाधन और डिजिटल सामग्री विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
आठवीं अनुसूची की मांग और आगे की चुनौती
छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के एक आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज है कि राज्य की ओर से इस संबंध में केंद्र सरकार को पत्र भेजे जाने की जानकारी दी गई थी। यह मुद्दा केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं है। इसके साथ भाषा के मानकीकरण, शोध, उच्च शिक्षा, शब्दावली निर्माण, अनुवाद और डिजिटल संसाधनों के विस्तार जैसे प्रश्न भी जुड़े हैं। यही वह क्षेत्र है जहां अनुवाद दिवस का महत्व और बढ़ जाता है।
अनुवाद छत्तीसगढ़ी के लिए क्यों बन सकता है विकास का माध्यम?
कल्पना कीजिए कि किसी ग्रामीण किसान के लिए नई कृषि तकनीक की जानकारी केवल जटिल तकनीकी भाषा में उपलब्ध न होकर सरल छत्तीसगढ़ी में भी उपलब्ध हो। किसी मरीज के लिए स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी स्थानीय भाषा में समझने योग्य हो। किसी विद्यार्थी को विज्ञान, गणित या डिजिटल तकनीक की सामग्री अपनी परिचित भाषा में मिले। यहां अनुवाद केवल भाषा परिवर्तन नहीं रह जाता, बल्कि ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम बन जाता है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी साहित्य के श्रेष्ठ कार्यों का हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, ओड़िया, बंगाली और अन्य भाषाओं में अनुवाद होने से राज्य की साहित्यिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच सकती हैं।
डिजिटल दुनिया में छत्तीसगढ़ी के लिए बड़ा अवसर
आज भाषा का विस्तार किताबों और कागजों से आगे बढ़कर मोबाइल, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट, वेबसाइट, ई-बुक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक पहुंच गया है। यहीं छत्तीसगढ़ी के सामने एक बड़ा अवसर है। यदि छत्तीसगढ़ी में पर्याप्त डिजिटल कॉर्पस, शब्दकोश, ऑडियो संग्रह, लोकसाहित्य का डिजिटलीकरण और उच्च गुणवत्ता वाले अनुवाद संसाधन तैयार किए जाएं तो भाषा को नई पीढ़ी के डिजिटल व्यवहार से जोड़ा जा सकता है। भाषा तकनीक के क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ी के लिए संभावनाएं हैं—जैसे स्पीच-टू-टेक्स्ट, टेक्स्ट-टू-स्पीच, मशीन ट्रांसलेशन, वर्तनी जांच, डिजिटल शब्दकोश और स्थानीय भाषा आधारित एआई सहायक। यह काम केवल तकनीकी कंपनियों का नहीं हो सकता। इसमें भाषाविदों, साहित्यकारों, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों, प्रशासन, तकनीकी विशेषज्ञों और स्थानीय समुदाय की साझेदारी आवश्यक होगी।
सबसे बड़ी जरूरत: भाषा का डिजिटल और अकादमिक दस्तावेजीकरण
छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए एक व्यापक भाषा संसाधन बैंक तैयार किया जा सकता है। इसमें लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, पारंपरिक शब्द, कृषि और वन आधारित शब्दावली, रिश्तेदारी संबंधी शब्द, स्थानीय भौगोलिक नाम, मुहावरे और विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित भाषाई रूपों का दस्तावेजीकरण शामिल हो सकता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भाषा की वास्तविक विविधता केवल पुस्तकों में नहीं मिलती; उसका बड़ा हिस्सा लोगों की बोलचाल और सामुदायिक स्मृति में मौजूद रहता है। भारत की जनगणना की 2011 की मातृभाषा तालिकाओं में छत्तीसगढ़ी को अलग प्रविष्टि के रूप में दर्ज किया गया है और छत्तीसगढ़ के जिलेवार स्तर तक मातृभाषा संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराए गए हैं। साथ ही, जनगणना की द्विभाषिकता-त्रिभाषिकता संबंधी तालिका भी यह बताती है कि भाषा का अध्ययन केवल मातृभाषा तक सीमित नहीं है; लोग एक से अधिक भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। इस बहुभाषी वास्तविकता को समझते हुए छत्तीसगढ़ी के विकास की रणनीति तैयार करना अधिक उपयोगी होगा।
छत्तीसगढ़ी से दुनिया तक और दुनिया से छत्तीसगढ़ी तक
भाषा का विकास तब अधिक व्यापक होता है जब वह केवल अपने भीतर संवाद न करे, बल्कि दूसरी भाषाओं से भी संवाद स्थापित करे। छत्तीसगढ़ी से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद होने पर छत्तीसगढ़ का लोकज्ञान बाहर जा सकता है। वहीं अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं से छत्तीसगढ़ी में अनुवाद होने पर दुनिया का ज्ञान स्थानीय पाठक तक पहुंच सकता है। इस दृष्टि से अनुवाद के दो रास्ते महत्वपूर्ण हैं—
पहला—‘छत्तीसगढ़ी से बाहर’ :
लोककथा, कविता, उपन्यास, नाटक, इतिहास, लोकज्ञान और संस्कृति का अन्य भाषाओं में अनुवाद।
दूसरा—‘बाहर से छत्तीसगढ़ी में’ :
विज्ञान, तकनीक, कृषि, स्वास्थ्य, कानून, वित्तीय साक्षरता और शिक्षा सामग्री का सरल छत्तीसगढ़ी में अनुवाद।
दोनों प्रक्रियाएं मिलकर भाषा को केवल विरासत की भाषा नहीं, बल्कि आधुनिक ज्ञान की भाषा बनाने में मदद कर सकती हैं।
स्कूल से विश्वविद्यालय और मीडिया तक
छत्तीसगढ़ी के विस्तार के लिए शिक्षा क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्राथमिक स्तर पर स्थानीय भाषा और लोकसंदर्भ आधारित सामग्री बच्चों को अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जोड़ सकती है। उच्च शिक्षा के स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति पर शोध, डिजिटल अभिलेखागार तथा तुलनात्मक भाषा अध्ययन के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। मीडिया के क्षेत्र में समाचार, वेब स्टोरी, रेडियो, पॉडकास्ट और वीडियो सामग्री छत्तीसगढ़ी को नई पीढ़ी के साथ जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
चुनौती केवल ‘भाषा बचाने’ की नहीं, ‘भाषा को आगे बढ़ाने’ की है
भाषाओं के संरक्षण की चर्चा अक्सर इस चिंता के साथ होती है कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें भूल न जाएं। लेकिन किसी भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिए केवल संरक्षण पर्याप्त नहीं है।
भाषा को नए विषयों की भाषा बनाना होगा। जब उसमें मोबाइल ऐप की जानकारी होगी, जब विज्ञान समझाया जाएगा, जब किसान नई तकनीक पढ़ सकेगा, जब युवा रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री समझ सकेगा, जब बच्चे डिजिटल कहानी देख सकेंगे और जब दुनिया के साहित्य का अनुवाद उसमें उपलब्ध होगा—तभी भाषा का विस्तार नई परिस्थितियों में भी स्वाभाविक रूप से होगा।
अनुवाद दिवस पर छत्तीसगढ़ी के लिए एक नई दिशा
अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषाओं के बीच संवाद किसी भाषा को छोटा नहीं करता, बल्कि उसकी पहुंच बढ़ाता है। संयुक्त राष्ट्र भी बहुभाषिकता को सांस्कृतिक विविधता, शिक्षा, विकास और समावेशी ज्ञान समाज से जोड़ता है। छत्तीसगढ़ी के संदर्भ में भी यही दृष्टि उपयोगी हो सकती है। छत्तीसगढ़ी को केवल छत्तीसगढ़ की पहचान के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, साहित्य, तकनीक और संवाद की आधुनिक भाषा के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा सकता है। इसके लिए तीन स्तरों पर लगातार प्रयास महत्वपूर्ण होंगे—भाषा का दस्तावेजीकरण, गुणवत्तापूर्ण अनुवाद और डिजिटल विस्तार। लोकगीतों और लोककथाओं में संचित विरासत से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर की नई तकनीक तक, छत्तीसगढ़ी के सामने संभावनाओं का एक विस्तृत संसार है। 30 सितंबर का अनुवाद दिवस इस यात्रा के लिए एक सार्थक संदेश देता है—भाषाएं दीवारें नहीं, संवाद के पुल हैं। छत्तीसगढ़ी जितनी भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही व्यापक उसकी दुनिया होगी।
-दीपक अग्मिनित्र
Author: cg24x7



